आपकी बात ................. हम सब वाकई कॉकरोच हैं ! .............आलेख ................. ...... रंजन श्रीवास्तव
जी हां महामहिम! आपने सही पहचाना। हम वाकई कॉकरोच हैं देश में बार-बार सामने आने वाली घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि आम नागरिक की पीड़ा और अधिकारों की आखिर कितनी कीमत रह गई है। नीट पेपर लीक, मतदाता सूची से नाम हटाने, किसानों की मौत, महिलाओं के उत्पीड़न, नोटबंदी और कोरोना लॉकडाउन जैसी घटनाओं ने व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर किया है। लाखों लोग आज भी न्याय और जवाबदेही का इंतजार कर रहे हैं, जबकि प्रभावशाली वर्ग पर इन घटनाओं का असर बहुत कम दिखाई देता है। वरिष्ठ पत्रकार श्री रंजन श्रीवास्तव ने आपकी बात स्तम्भ में आम जनता के संघर्ष, असुरक्षा और उपेक्षा को “कॉकरोच” जैसे प्रतीक के माध्यम से तीखे ढंग से व्यक्त किया है। सम्पादक
आपकी बात
हम सब वाकई कॉकरोच हैं !
- रंजन श्रीवास्तव
एक ऐसा वजूद जिसकी कोई पहचान नहीं है, उसको सदियों से जीते जीते याद ही नहीं रहता कि इसको नाम क्या दें ? “आम आदमी” विशेषण तो अस्तित्व का एक हिस्सा बन गया है। अब इसमें कोई नयापन नहीं दिखता। फिर किसी ने कुछ वर्षों पूर्व “कैटल क्लास” बोला तो कुछ अच्छा लगा। पर इसमें अंग्रेजियत थी। अतः लगा नहीं कि ये हमारे अस्तित्वहीन जीवन को सही तरीके से परिभाषित करता है। अब जाकर एक सही विशेषण मिला है- कॉकरोच….
महामहिम, आपने बिल्कुल सही विशेषण दिया है। हम कॉकरोच ही तो हैं।
22 लाख से ज़्यादा बच्चे डॉक्टर बनने के लिए नीट (NEET) में भाग लेते हैं और टेस्ट के पहले ही पेपर लीक हो जाता है। पेपर बाज़ार में 30 हज़ार रुपये से लेकर 5 लाख रुपये में बिकता है। जांच एजेंसियां सोई रहती हैं। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जिसको फ्री और फेयर एग्जाम कराने के लिए ज़ोर-शोर से स्थापित किया गया था, उसे भी कुछ पता नहीं रहता है। लीक पर एक्शन तब शुरू होता है जब एक कोचिंग इंस्टीट्यूट का शिक्षक उस लीक को पकड़ता है और व्हिसलब्लोअर बनकर इस मुद्दे को उजागर करता है।
2024 में भी पेपर लीक हुआ था। लीक के सबूत भी मिले। चालीस लोगों से ज़्यादा अरेस्ट भी हुए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा पर सुप्रीम कोर्ट ने री-एग्जाम का ऑर्डर देने से मना कर दिया। उसके पहले भी नीट (NEET) का पेपर लीक हुआ। जो एनटीए के ज़िम्मेदार लोग थे, उनको सज़ा देने की बजाय बाद में अच्छी पोस्टिंग दे दी गई। लाखों बच्चों के भविष्य के साथ नेशनल टेस्टिंग एजेंसी और पेपर माफिया इसलिए खेलते रहे क्योंकि इससे प्रभावित लोग कॉकरोच थे, एलीट नहीं।
एलीट लोगों को इस तरह के पेपर लीक से कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनके बच्चे या तो विदेशों में पढ़ रहे होते हैं या अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे होते हैं।
देश के लोकतंत्र के इतिहास में यह पहली बार होता है कि 27 लाख लोगों का नाम मतदाता सूची से लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के नाम पर हटा दिया जाए और सबसे बड़े कोर्ट से यह टिप्पणी आए कि “इस बार नहीं तो अगली बार वोट दे देंगे” । ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि आम मतदाता भी कॉकरोच प्रजाति से ही आता है।
लगभग 9 वर्ष बीत जाने के बाद भी मध्य प्रदेश के मंदसौर के जिन छह किसानों की पुलिस और सीआरपीएफ (CRPF) के फायरिंग और लाठीचार्ज में जानें गईं उनके परिवारों को आज तक न्याय का इंतज़ार है। पुलिस और सीआरपीएफ के दोषी अधिकारियों को तो सज़ा नहीं मिली पर तत्कालीन सरकार ने हर परिवार को 1 करोड़ रुपये मुआवज़ा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि जो किसान गोली से मारे गए और जो घायल हुए, सरकार की नज़र में वे सभी कॉकरोच थे ।
उत्तर प्रदेश में लखीमपुर खीरी में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का बेटा सत्ता में मदमस्त होकर कई किसानों को अपनी गाड़ी से कुचलकर मार डालता है। उत्तर प्रदेश में ही सत्ता के मद में चूर एक विधायक और उसके सहयोगी एक लड़की से बार-बार बलात्कार करते हैं। उसके पिता को पुलिस द्वारा झूठे केस में फंसाकर जेल भेज दिया जाता है जहां उसकी मृत्यु हो जाती है। बाद में एक एक्सीडेंट में उस लड़की की रिश्तेदार जो उक्त अपराध की गवाह भी थी, की मौत होती है तथा उसका वकील घायल होता है।
लड़की को न्याय तभी मिलता है जब वह मुख्यमंत्री के निवास के बाहर आत्मदाह का प्रयास करती है और मुकदमे को उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली ट्रांसफर किया जाता है।
कुश्ती के खेल में देश का नाम रोशन करने वाली महिलाएं देश की राजधानी दिल्ली में अपने फेडरेशन के तत्कालीन मुखिया के ऊपर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाती हैं, पर इसकी सज़ा मुखिया को यही मिलती है की सत्ताधारी पार्टी अगले चुनाव में उन्हें टिकट न देकर उनके बेटे को टिकट देती है और वो चुनाव जीत भी जाते हैं।
देश में नोटबंदी में लाखों लोग कतार में खड़े रहे जिनमें कईयों की मौत होती है। कोरोना में अचानक लॉकडाउन होने से हज़ारों मज़दूर सैकड़ों मील पैदल अपने परिवार और बच्चों के साथ यात्रा करते हैं जिनमें कईयों की मौत होती है। इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 30 से 32 लोगों की मौत हो जाती है। कार्रवाई के नाम पर वही खानापूर्ति। छिंदवाड़ा में कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत।
रोज़ाना ऐसी अनगिनत घटनाएं हो रही हैं जिनमें मानव अधिकार का उल्लंघन हो रहा है। लोगों की जानें जा रही हैं। न्याय के इंतज़ार में लाखों लोग तहसील से लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत तक चक्कर लगा रहे हैं। पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों के अनुसार हर वर्ष 10 हज़ार से ज़्यादा किसानों ने अपने जीवन को स्वयं समाप्त कर लिया।
एनसीआरबी के वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार देश भर में 76,069 बच्चे किडनैप रिपोर्ट किए गए जिनमें 62,099 बच्चियां थीं। इन्हीं आंकड़ों के अनुसार 51,100 ऐसे नाबालिग बच्चे थे जिनकी अपहरण के बाद रिकवरी नहीं की जा सकी थी, इनमें 40,219 नाबालिग बच्चियां थीं ।
जी हां महामहिम! आपने सही पहचाना। हम वाकई कॉकरोच हैं।

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