जुड़वां शिशुओं का गांव कोडिन्ही की माताएं कैसे कराती हैं स्तनपान ?
जुड़वां शिशुओं का गांव कोडिन्ही
माताएं कैसे कराती हैं स्तनपान ?
भोपाल। भारत का एकमात्र केरल का कोडिन्ही गांव, जहां जुड़वा बच्चों की संख्या सबसे ज्यादा है। नवजात शिशुओं के लिए पहले एक हजार दिन सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और इन एक हजार दिनों में जन्म से लेकर छह माह तक नवजात को मां का दूध ही आहार होता है। “ट्विन टाउन’ के नाम से मशहूर कोडिन्ही गांव की माताएं भी अपने नवजात शिशुओं को स्तनपान कराती हैं लेकिन जिन माताओं के जुड़वा शिशु हैं, उन्हें कोई परेशानी तो नहीं होती या उन्हें मानसिक और शारीरिक रूप से क्या समस्याएं आती हैं, भोपाल स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की सहायक प्राध्यापक डॉ. गीता भारद्वाज ने एम्स भुवनेश्वर की डॉ. एम. वी. स्मिथा के सहयोग से जुड़वां शिशुओं की माताओं में स्तनपान व्यवहार पर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। अध्ययन में पाया गया कि जुड़वां शिशुओं में समय से पहले जन्म, कम जन्म वजन और संक्रमण का खतरा अधिक होता है। ऐसे में शिशुओं के पहले छह महीनों में केवल स्तनपान उनके स्वस्थ विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
हालांकि, एक साथ दो नवजात शिशुओं की देखभाल माताओं पर शारीरिक और मानसिक रूप से अत्यधिक दबाव डालती है, जिससे केवल स्तनपान कराना कठिन हो जाता है। शोध के अनुसार केवल 4 प्रतिशत माताएं ही पहले छह महीने तक जुड़वां बच्चों को स्तनपान करा सकीं। लगभग 70 प्रतिशत माताओं ने स्तनपान के दौरान अत्यधिक थकान की शिकायत की। दूध की मात्रा कम होने का डर और एक साथ दो बच्चों को संभालने में कठिनाई आम समस्याएं रहीं। इसके बावजूद कई माताओं ने 1 से 2 वर्ष तक स्तनपान जारी रखा और कुछ माताओं ने दोनों शिशुओं को एक साथ दूध पिलाने की पद्धति भी अपनाई।
शोधकर्ताओं के अनुसार, भले ही केवल स्तनपान कराना हर मां के लिए संभव न हो, लेकिन लंबे समय तक स्तनपान और एक साथ दोनों शिशुओं को दूध पिलाने की प्रक्रिया भी जुड़वां बच्चों के लिए अत्यंत लाभकारी है। कोडिन्ही जैसे उच्च जुड़वां जन्म वाले क्षेत्रों से प्राप्त अनुभव स्वास्थ्यकर्मियों, अस्पतालों और परिवारों को जुड़वां शिशुओं की माताओं के लिए बेहतर सहयोग और मार्गदर्शन देने में सहायक हो सकते हैं। स्वास्थ्यकर्मियों के लिए शोध में यह संदेश भी दिया गया है कि किसी भी मात्रा में स्तनपान को प्रोत्साहित किया जाए, माताओं के प्रयासों की खुले रूप से सराहना की जाए, जुड़वां शिशुओं को दूध पिलाने की सरल विधियां सिखाई जाएं और माताओं को भावनात्मक व व्यावहारिक सहयोग दिया जाए। सकारात्मक प्रोत्साहन से माताओं का आत्मविश्वास बढ़ता है और स्तनपान जारी रखने में मदद मिलती है।
क्यों खास है कोडिन्ही
देश के प्राय: सभी जिलों में एक ऐसे दो गांव जरूर होते हैं जो पर्यटन, हस्तशिल्प, संस्कृति, त्यौहार, कला आदि के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। लेकिन केरल का एक ऐसा गांव भी है जिसकी वहां जन्म लेने वाले शिशुओं के कारण अपनी अलग पहचान है। केरल के मलप्पुरम जिले का कोडिन्ही एक छोटा‑सा गाँव है जिसकी वैश्विक पहचान वहां की असामान्य रूप से उच्च जुड़वाँ जन्म दर है। कोडिन्ही गांव में जुड़वाँ बच्चों की संख्या बहुत अधिक है। यहाँ अनुमानतः 400 से 450 जोड़े जुड़वाँ यानी लगभग 800 से 900 बच्चे पैदा होते हैं । यह संख्या दुनिया के जुड़वा बच्चों के जन्म के औसत की तुलना में कई गुना अधिक है।
आमतौर पर एक हजार बच्चों का जन्म होता है उनमें औसतन लगभग 9 जुड़वाँ बच्चे होते हैं लेकिन कोडिन्ही में यह संख्या लगभग 45 प्रति 1000 है अर्थात लगभग छह गुना अधिक है। इसी कारण कोडिन्ही को “ट्विन टाउन’ कहा जाता है और जो आज भी दुनियाभर के शोधकर्ताओं के लिए एक रहस्य बना हुआ है। लगभग 400 से 500 जोड़ी जुड़वां बच्चों की उपस्थिति वाले इस छोटे से गांव में जुड़वां जन्मों की बड़ी संख्या वर्षों से वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित करती रही है। यह गाँव देश में सबसे अधिक और विश्व में दूसरे स्थान पर सबसे अधिक जुड़वां जन्म दर के लिए जाना जाता है। वैसे कोडिन्ही अकेला गांव नहीं है जहाँ उच्च जुड़वाँ जन्म दर देखी गई हो। दुनिया में नाइजीरिया के इग्बो ओरा (Igbo Ora) और ब्राज़ील के गोडोई (Godoi) जुड़वाँ बच्चों के जन्म के कारण पहचाने जाते हैं । नाइजीरिया के इग्बो ओरा को तो “Twin Capital of the World” के नाम से पहचाना जाता है।
अधिक जुड़वाँ बच्चों के जन्म का रहस्य
कोडिन्ही में भारत के सबसे ज्यादा जुड़वा बच्चों का जन्म क्यों होता है, यह प्रश्न अभी भी वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली बना हुआ है। कई वैज्ञानिक और अनुसंधानकर्ता इस पर अध्ययन कर चुके हैं । इन शोधों के दौरान आनुवंशिकी की भूमिका, गाँव के पानी, हवा और पर्यावरण की रसायनात्मक जांच करने के साथ डी.एन.ए. और बाल/लार के नमूने लेकर जांच की गई लेकिन अब तक कोई निर्णायक वैज्ञानिक कारण नहीं मिला है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस घटना में संभवतः आनुवंशिक, पर्यावरणीय, आहार संबंधी और अनजानी जैव‑रासायनिक प्रक्रियाएँ शामिल हो सकती हैं, लेकिन कोई एक स्पष्ट कारण सिद्ध नहीं हुआ है। वहीं स्थानीय लोगों में यह धारणा भी है कि यह गाँव विशेष रूप से जुड़वाँ जन्मों के लिए “दिव्य आशीर्वाद” प्राप्त करता है हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह मान्यता उचित नहीं है। कोडिन्ही एक साधारण गाँव से कहीं अधिक है और यह एक वैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीक भी बन चुका है। जहाँ करीब दो हजार परिवार रहते हैं और जहाँ लगभग हर घर में जुड़वाँ बच्चों की उपस्थिति है। यह स्थान न केवल केरल बल्कि पूरे भारत के लिए गर्व और जिज्ञासा का विषय बन चुका है। यह गाँव हमें यह भी याद दिलाता है कि प्रकृति में अभी भी बहुत सी चीजें हैं जिनका कारण विज्ञान पूर्ण रूप से समझ नहीं पाया है और कोडिन्ही उन रहस्यों में से एक है।
