बढ़ती उम्र, घटती संवेदनाएँ ........................ आलेख.................. श्याम यादव
विश्व वृद्ध दिवस पर विशेष आलेख.....
बढ़ती उम्र, घटती संवेदनाएँ
- श्याम यादव
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संयुक्त परिवारों के बिखरने के बाद बुजुर्गों का जीवन सम्मान और सहारे से अधिक अकेलेपन और उपेक्षा का प्रतीक बनता जा रहा है। विश्व वृद्ध दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम सचमुच उस पीढ़ी के साथ खड़े हैं, जिसने कभी हमारे लिए अपना सब कुछ न्योछावर किया था ?
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एक अक्टूबर को पूरी दुनिया विश्व वृद्ध दिवस मनाती है। यह तारीख केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे समाज के सामने खड़े उस आईने की तरह है, जिसमें हम अपनी संवेदनाओं और जिम्मेदारियों को साफ देख सकते हैं। यह दिन पूछता है कि क्या हमने उन लोगों के प्रति अपना दायित्व निभाया है, जिन्होंने कभी परिवार और समाज की नींव अपने परिश्रम और त्याग से मजबूत की थी ?
भारत में वृद्धों की स्थिति पर नज़र डालें तो यह प्रश्न और भी तीखा हो उठता है। पारंपरिक भारतीय समाज की सबसे बड़ी शक्ति माने जाने वाले संयुक्त परिवार अब तेजी से टूट रहे हैं। कभी इन्हीं परिवारों में बुजुर्ग घर के केंद्र में हुआ करते थे—निर्णय लेने वाले, अनुभव साझा करने वाले और आशीर्वाद देने वाले। लेकिन आधुनिक जीवनशैली, रोजगार की मजबूरियाँ और शहरीकरण की दौड़ ने परिवारों की संरचना को बदल दिया है। अब बुजुर्गों का स्थान घर के आँगन से खिसककर वृद्धाश्रमों और एकाकीपन के कमरों में सिमटता जा रहा है।
संयुक्त परिवारों के टूटने का असर सबसे अधिक वृद्धों पर पड़ा है। परंपरागत व्यवस्था में उनका बुढ़ापा केवल सहारे से नहीं, बल्कि सम्मान से भी भरा होता था। बच्चों के बीच रहते हुए वे अनुभव बाँटते थे, नाती-पोतों को संस्कार देते थे और जीवन की संध्या भी एक जीवंतता के साथ बिताते थे। लेकिन अब छोटे परिवारों की अवधारणा में बुजुर्ग अतिरिक्त जिम्मेदारी समझे जाने लगे हैं। यही कारण है कि वृद्धावस्था का मतलब अब अक्सर अकेलापन, असुरक्षा और अवसाद बन गया है।
आँकड़े इस बदलाव की कठोर तस्वीर पेश करते हैं। जनगणना और सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में आज लगभग 15 करोड़ लोग साठ वर्ष से अधिक आयु के हैं। 2050 तक यह संख्या दोगुनी होकर 30 करोड़ के पार पहुँचने वाली है। यानी हर पाँचवाँ भारतीय वृद्ध होगा। इतनी बड़ी आबादी के लिए क्या हमारे पास संवेदनाओं और व्यवस्थाओं का वह तंत्र है, जिसकी उन्हें आवश्यकता है? दुर्भाग्य यह है कि जवाब नकारात्मक मिलता है।
गाँवों में अब भी आधे से अधिक वृद्ध अपने बच्चों पर आर्थिक रूप से निर्भर हैं। शहरों में स्थिति और जटिल है। वहाँ आर्थिक सुरक्षा तो कुछ हद तक मिल जाती है, लेकिन भावनात्मक सहारा गायब होता जा रहा है। अकेलेपन से जूझते वृद्ध मोबाइल और इंटरनेट की दुनिया में अपने ही घरों में परायापन महसूस करने लगे हैं। वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या इस कटु सच्चाई की गवाही देती है कि पारिवारिक बंधन टूटने का खामियाजा सबसे पहले बुजुर्ग ही भुगतते हैं।
स्वास्थ्य भी एक बड़ी चुनौती है। वृद्धावस्था अपने साथ कई बीमारियाँ लेकर आती है—हृदय रोग, मधुमेह, रक्तचाप और हड्डियों की कमजोरी जैसी समस्याएँ लगभग हर परिवार में दिखने लगी हैं। परंतु स्वास्थ्य सेवाओं का ढाँचा इस तेजी से बढ़ती आबादी के लिए तैयार नहीं है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर शहरी अस्पतालों तक बुजुर्गों के लिए विशेष व्यवस्था का अभाव है। सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ कागज़ों पर तो मौजूद हैं, लेकिन इनका लाभ केवल एक हिस्से तक ही पहुँच पाता है। आँकड़ों के अनुसार, देश के 40 प्रतिशत से भी कम पात्र बुजुर्गों को नियमित पेंशन या सुरक्षा लाभ मिलते हैं। बाकी लोगों के लिए यह जीवन अपने परिश्रम की बजाय दूसरों की कृपा पर निर्भर रहने जैसा हो जाता है।
लेकिन इस पूरी स्थिति का सबसे गंभीर पहलू केवल आर्थिक या स्वास्थ्य संबंधी नहीं है। असली संकट भावनाओं का है। बुजुर्गों को सबसे अधिक चोट तब लगती है जब वे अपने ही घरों में अस्वीकार और उपेक्षा महसूस करते हैं। आज की पीढ़ी अपने करियर, स्वतंत्रता और आधुनिक जीवन की भागदौड़ में इतनी उलझी हुई है कि उसे अपने माता-पिता के लिए समय निकालना कठिन लगता है। जिस घर की नींव कभी इन्हीं बुजुर्गों ने अपने त्याग से डाली थी, उसी घर में अब वे बोझ समझे जाने लगे हैं।
यही कारण है कि वृद्धावस्था में मानसिक समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2023 के अनुसार, 60 वर्ष से ऊपर के लगभग 15 प्रतिशत लोग अवसाद और मानसिक तनाव से जूझ रहे हैं। अकेलापन, उपेक्षा और असुरक्षा का यह घेरा उनके जीवन को और भी कठिन बना देता है। यह स्थिति केवल सामाजिक संरचना की विफलता नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं के क्षरण का प्रमाण भी है।
दुनिया के विकसित देशों ने इस चुनौती का सामना करने के लिए अनेक व्यवस्थाएँ विकसित की हैं—घर पर देखभाल की सेवाएँ, स्वास्थ्य बीमा, सामुदायिक केंद्र और पेंशन योजनाएँ। भारत में भी ऐसी पहलें होनी चाहिए, लेकिन सबसे बड़ी जरूरत मानसिकता बदलने की है। कानून और योजनाएँ केवल सहारा दे सकती हैं, लेकिन सम्मान और अपनापन केवल परिवार और समाज ही दे सकते हैं।
विश्व वृद्ध दिवस हमें यह याद दिलाने का अवसर है कि सभ्यता की पहचान केवल उसकी प्रगति से नहीं, बल्कि उसके बुजुर्गों के साथ उसके व्यवहार से होती है। यदि हम अपने बुजुर्गों के अनुभव, ज्ञान और आशीर्वाद को महत्व नहीं देंगे, तो हम केवल अपने अतीत से नहीं कटेंगे, बल्कि अपने भविष्य को भी खो देंगे।
भारत आज युवा राष्ट्र कहलाने पर गर्व करता है। लेकिन यह भी सच है कि हर युवा कल वृद्ध होगा। जो व्यवहार हम आज अपने बुजुर्गों के साथ करेंगे, वही हमारे लिए कल लौटकर आएगा। इसलिए यह समय है कि परिवार, समाज और सरकार मिलकर वृद्धों के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन का माहौल बनाएँ।
वृद्ध केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारे जीवन की जड़ों से जुड़ा वह आधार हैं, जिसके बिना कोई भी समाज टिक नहीं सकता। विश्व वृद्ध दिवस हमें यह चेतावनी देता है कि अगर हमने आज संवेदना नहीं दिखाई, तो कल संवेदना हमें भी नहीं मिलेगी। यही सच्चाई है—बढ़ती उम्र के साथ यदि संवेदनाएँ घटती जाएँ, तो यह केवल बुजुर्गों की नहीं, पूरे समाज की हार होगी।
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वरिष्ठ पत्रकार श्री श्याम यादव लम्बे समय तक भारत संचार निगम लिमिटेड, इंदौर में जन सम्पर्क अधिकारी का दायित्व निभाते रहे हैं। सेवानिवृत्त होने के पश्चात वे राजनीति और समसामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। साहित्यानुरागी श्री यादव कहानी और व्यंग्य लेखन में भी सिद्धस्त हैं।

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