व्यंग्य
महालूट  वितरण  कंपनी
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   अर्द्ध रात्रि में विक्रम ने फिर बेताल को कंधे पर बैठा लिया  और हाथों में नंगी तलवार लिए स्मशान की ओर चल पड़ा। यह विक्रम और बेताल के किस्से हमारे बचपन से पचपन के हिस्से रहे हैं।युवा पीढ़ी को कौन बताए की पिछली पीढ़ी में यह मोबाईल, लैप टॉप,इंटर नेट की सुविधा नहीं थी , बस इंटर तक पढ़ लो और आगे कुछ नहीं कर सको तो काम धंधे लग चार पैसा घर में लाने लगो। बाबूजी के हाथ में पैसा धरने लगो और वे लाल के हाथ पीले करने की जुगत में लग जाएं।
  
    लब्बो लुआब यह  की इसी वजह से लोक कहानियां, चौपालों पर जिंदा रही। जवान होते बच्चों की जवान होती रातें इन्हीं किस्से कहानियों के इर्द गिर्द ढल जाती और रातें हाथ में नंगी तलवार लिए विक्रम की फंतासियों में उलझी रहती और फिर दूसरी शाम के चौपाल की बैठक तक मुकद्दस मुकर्रर रहती। कभी कभार एकाध किताब लैला मजनूं की या गालिब के शेरों की हाथ लग जाए तो मानो लक्ष्मी लॉटरी का इनाम खुल गया।लॉटरी टिकटों का जमाना था।जल्दी जल्दी अमीर बनने का इससे अधिक सुविधा जनक और सस्ता शॉर्ट कट नहीं था ,रुपए दो रुपए का टिकट और सप्ताह भर के ख्वाब और रिजल्ट देखने के लिए सुबह के अखबार में लॉटरी का विज्ञापन देखते पिता भी समझ जाते की होनहार लाल भी पेपर हड़पने की तैयारी में है मतलब चोरी छिपे एक टिकट इसने भी हथियाया है और बिना कुछ कहे ही बाप बेटों की जुगलबंदी हो जाती , उधर मां रसोई से कनखियों से इस गणित को समझ लेती और गणेश जी को मक्खन लगाने जोर जोर से घंटी बजा देती।

     यह लॉटरी का टिकट धीरे धीरे प्यार से हमारी जेबें कतरता रहता और बुराई होकर भी हमारे सपनों को सहलाते रहता।ऐसे ही आजकल उजाले के नाम पर अंधेरा और अंधेर गर्दी मचाकर अंधी लूट की जा रही है।एक बानगी देखिए

दाढ़ी मात्र रु.10/-
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वितरण कंपनी में सेवारत एक अधिकारी दाढ़ी बनवाने एक सैलून में गये और सैलून में लगे बोर्ड को पढ़ने लगे....

👉 दाढ़ी ---------  ₹.10/-
👉ब्लेड अधिभार. ₹. 2/-
👉उस्तरा भाड़ा .. ₹. 3/- 
👉क्रीम ---------- ₹.  5/-
👉 बिजली भाड़ा     20/-
👉 कैंची भाड़ा -- ₹.  3/-  
👉 कुर्सी भाड़ा -- ₹.10/- 
👉लोशन -------- ₹.  7/- 
👉पाउडर ------- ₹.  5/-  
👉नॅपकिन भाड़ा.₹. 5/- 
      योग ......... ₹. 70/-
 बोर्ड पढ़कर अधिकारीजी बोले :-- "तुम तो कमाल करते हो यार...!  दाढ़ी मात्र १० रु. लिखकर  अन्य दूसरे छुपे खर्चे जोड़कर ग्राहकों को 'लूटते'  हो...??"

सैलून स्वामी : -- "मेरे द्वारा इस बोर्ड पर शुद्ध हिन्दी में और सुपाठ्य बड़े अक्षरों में  स्पष्ट लिखने से मेरे काम पर टिप्पणी कर रहे हो साहब...?
और आपकी महावितरण कंपनी में सालों से उपभोक्ताओं के साथ "महाछल" जारी है उसका क्या...??"

👉स्थायी प्रभार
👉 विद्युत प्रभार
👉 विद्युत वहन प्रभार 
👉 ईंधन समायोजन प्रभार 

👉 विद्युत शुल्क 
👉 विद्युत बिक्री कर,
👉व्याज, 
👉 अन्य प्रभार
👉चालू विद्युत देयक, 
👉 पूर्व बकाया 
👉समायोजित राशि 
👉 बकाया ब्याज राशि 
👉कुल बकाया राशि 
👉कुल देयक राशि 
.... पूर्णांक देयक..
" अब आप ही बतायें.... ऐसे विद्युत बिल पर आज तक कितने लोगों ने आपत्ति जताई ...?"
और.....
महावितरण अधिकारी दाढ़ी बनवाये बिना ही लौट गये ....!
आम उपभोक्ताओं की आंखें खुलने तक ..जब तक जनता लुट जाने को तैयार है तब तक "महावितरण कंपनी" की लूट जारी है...!!

      जागो.! ग्राहक जागो.!! का नारा मत लगाइए न तो उपभोक्ता फोरम, फौरन आदेश देते हैं और न सूचना का अधिकार सीधे मुंह जवाब देता है, उच्चाधिकारी के कान हैं ,ध्यान है, कानों तक जूं है भी रेंगती है मगर उन्हें फुरसत नहीं है।ऊपर से वीडियो कांफ्रेंसिंग ने उन्हें उलझा रखा है, अर्दली और पीए उनके कमरों तक जाने नहीं देते।साहब व्यस्त हैं ,व्यवस्था ध्वस्त है,,,,, हां यदि सौ दो सौ चाय पानी के इनके यक्ष पाल को दे दिए जाएं तो साहब सुलभ है।

    इधर सरकार ने ऊर्जा की आपूर्ति बढ़ने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए, पर्यावरण हितेषी सौर ऊर्जा का दोहन करने के लिए अनुदान योजना को साकार करने का महाअभियान चलाया है मगर अपेक्षित सहयोग और परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं ।कारण यह है की एक तरफ सरकार ने अनुदान दूना कर दिया है मगर चोर रास्तों से वितरण कंपनियां उपभोक्ता का तेल निकालने में पीछे नहीं है। उपभोक्ता सोलर प्लांट लगवा ले ,तब भी ये कंपनियां उनसे विद्युत उपभोग शुल्क वसूल रही हैं।यानी सोलर प्लांट आपका , सूर्य ऊर्जा आपकी, ज्यादा है वह कंपनी आपसे ले लेती है ,उसे भी वह बिना ब्याज वापरेगी , साल भर में आप प्रयोग कर लें वरना उधार दिया यूनिट्स बराबर ,ऊपर से अलग अलग शुल्क वसूली जारी है, चाय पानी लाइन मैन नहीं मांगेगा तो उसका भाई ठेकेदार का आदमी मीटर रीडर मांग लेगा। आखिर लुटेरों के हरकारे भी जेब काटने में पीछे क्यों रहे।हम किसी से कम नहीं की आत्मा का उनमें भी वास है और आत्मा शरीर बदलती है।राम लाल आए या रहीम आए आत्मा अजर अमर है उसके गुण नहीं बदलते।
सद्गुण जारी है हम ही प्रभु तुच्छ हैं जो इन साधनों और साधक की भाषा को नहीं समझते, गुण ग्रहण नहीं करते और जब तब इनकी भर्त्सना करते रहते हैं।

मन में विचलन बहुत है
आज का चलन यही है
ऊपर उठ जा रे बंदे तू
सीख ले सब धंधे तू

व्यापार कर रहे सब
आहार कर रहे सब
मत कह अत्याचार
समझ ले यह व्यवहार

।। अरुण कुमार जैन ।।
लेखक एवम् साहित्यकार 
arunkumarjain28@gmail.com