चिकित्सा बीमा दावा विवाद......... बीमा लोकपाल के आदेश पर कानूनी सवाल
चिकित्सा बीमा दावा विवाद.........
बीमा लोकपाल के आदेश पर कानूनी सवाल
इंदौर | चिकित्सा बीमा दावे की अस्वीकृति को लेकर इंदौर निवासी जेम्स पाल द्वारा बीमा लोकपाल, भोपाल के समक्ष दर्ज कराई गई शिकायत अब कानूनी बहस का विषय बन गई है। शिकायतकर्ता ने लोकपाल द्वारा पारित आदेश में प्रक्रियात्मक त्रुटियों, साक्ष्यों की अनदेखी और अत्यधिक विलंब का आरोप लगाते हुए इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताया है।
शिकायत क्रमांक BHP-H-020-2526-0588 से जुड़े इस प्रकरण में बीमाधारक का दावा है कि उन्हें अत्यंत गंभीर चिकित्सकीय अवस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया था। उपचार अभिलेखों के अनुसार भर्ती के समय उनकी नाड़ी लगभग 200 और रक्तचाप 50/50 दर्ज किया गया, जिसे शिकायतकर्ता मेडिकल इमरजेंसी बताते हैं। इसके बावजूद बीमा कंपनी ने 24 घंटे की भर्ती शर्त की तकनीकी व्याख्या करते हुए दावा अस्वीकार कर दिया।
कानूनी दृष्टि से महत्वपूर्ण यह भी है कि बीमा कंपनी द्वारा यह आरोप लगाया गया कि भर्ती के दौरान मरीज व्यक्तिगत कारणों से अस्पताल से बाहर गया, जबकि शिकायतकर्ता के अनुसार इस आरोप के समर्थन में न तो कोई सीसीटीवी फुटेज, न अस्पताल रिकॉर्ड और न ही किसी चिकित्सकीय स्टाफ का बयान उपलब्ध कराया गया। विधि विशेषज्ञों के अनुसार, बिना ठोस साक्ष्य के ऐसे आरोप दावा अस्वीकृति का वैध आधार नहीं माने जा सकते।
शिकायतकर्ता ने यह भी आपत्ति उठाई है कि उपचारकर्ता चिकित्सक का लिखित स्पष्टीकरण पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका था, किंतु आदेश में यह दर्ज किया गया कि ऐसा कोई स्पष्टीकरण प्राप्त नहीं हुआ। यह स्थिति, उनके अनुसार, रिकॉर्ड की अपूर्ण प्रस्तुति और पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन की ओर संकेत करती है।
मामले में समयसीमा को लेकर भी कानूनी सवाल खड़े हुए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि शिकायत 24 मार्च 2025 को दर्ज की गई थी, जबकि रिकॉर्ड में शिकायत प्राप्ति की तिथि 23 जून 2025 दर्शाई गई। इसके बाद पहली सुनवाई जनवरी 2026 में होना, लगभग 300 दिनों का अंतर, चिकित्सा बीमा मामलों में त्वरित न्याय की अवधारणा के विपरीत माना जा रहा है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि दावा अस्वीकृति में चिकित्सकीय साक्ष्यों की अनदेखी, रिकॉर्ड में तथ्यात्मक त्रुटियां और अनुचित विलंब प्रमाणित होते हैं, तो यह उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत सेवा में कमी की श्रेणी में आ सकता है।
शिकायतकर्ता ने संकेत दिया है कि यदि बीमा लोकपाल स्तर पर राहत नहीं मिलती, तो वे उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग सहित अन्य न्यायिक मंचों के समक्ष अपील करेंगे। यह मामला बीमा दावों के निपटारे में पारदर्शिता, प्रक्रिया और जवाबदेही को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है।
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