वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व सूचना आयुक्त श्री विजय मनोहर तिवारी वर्तमान में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल  में  “कुलगुरू” का दायित्व संभाल रहे हैं   विश्वविद्यालय में हाल ही में उन्होंने प्रख्यात कलाकार पंकज त्रिपाठी को आमंत्रित किया था।  श्री त्रिपाठी ने विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों से खुलकर बात की और सवालों के बेबाकी से जवाब दिये।  कुलगुरू श्री तिवारी के आलेख  पंकज त्रिपाठी की मास्टॅर क्लास  में पढ़िए  चर्चा का सार ………..

 

पंकज त्रिपाठी की मास्टर क्लास

 

  • विजय मनोहर तिवारी 
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     पंकज त्रिपाठी मुम्बई के हिंदी सिनेमा में संघर्ष से प्राप्त सफलता की एक सबसे ताजा कहानी के नायक हैं। साधारण से असाधारण बनने की उनकी यात्रा जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने को उत्सुक युवाओं के लिए एक प्रेरक पाठ है। 

      भारत में मीडिया की प्रतिष्ठित विद्यापीठ माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के परिसर में मंगलवार की शाम उनकी मास्टर क्लास एक यादगार सत्र बन गई। समय एक घंटे का तय हुआ था किन्तु सवा घंटे के बाद भी बिना घड़ी देखे वे बड़े धैर्य से आखिरी प्रश्न का उत्तर दिए बिना हिले नहीं। 850 से अधिक क्षमता का भव्य गणेश शंकर विद्यार्थी सभागार पूरा भरा था। मंच के सम्मुख हम सब विद्यार्थी भाव से इस क्लास में शामिल हुए। 

     तीन दशक बाद कुलगुरु के रूप में लौटकर मुझे भी इस मास्टर क्लास में एक विद्यार्थी के रूप में शामिल होने का अवसर मिला। पंकज त्रिपाठी के अनुभव का निचोड़ है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है। कठोर परिश्रम, हर प्रकार की परिस्थिति का सामना करने लायक धैर्य और अपने लक्ष्य पर एकाग्रता अगर है तो केवल समय की बात है, सफल होने से कोई ताकत रोक नहीं सकती। 

      बुलंद आवाज के धनी प्रख्यात एक्टर विजय विक्रम सिंह इस मास्टर क्लास में मॉडरेटर थे। विद्यार्थियों के चुनिंदा सवाल भी उन्होंने ही किए। पंकज त्रिपाठी ने यहाँ आकर अपनी विद्यार्थी जीवन को याद किया। सामने बैठे हर विद्यार्थी से वे रूबरू हुए। 

 

जो कुछ कहा, वह इस प्रकार है-

 

मैं जब पहली बार भोपाल आया तो ओबेदुल्लागंज स्टेशन पर उतरा। वहाँ से सीधे भारत भवन गया। डेढ़ सौ दर्शक थे। दस साल बाद जब फिर उतरूंगा तो ऐसा ही होगा। जीवन में सफल हैं तो असफल भी होना ही है। सफलता को कैसे हैंडल करना है, इस पर कोई पॉडकास्ट नहीं। हमें केवल अपने कठोर परिश्रम और लक्ष्य पर एकाग्र होने के सिवा कोई विकल्प नहीं।

आप पत्रकारिता में हैं इसलिये जहाँ कहीं प्रतिभा को देखें, उसके बारे में लिखें और दूसरों को बतायें। मेरे आरंभिक जीवन में पटना के एक अखबार ने यह लिख दिया था कि पंकज त्रिपाठी में अभिनय की अपार संभावनाएँ हैं, और मैंने पाया कि उस एक पंक्ति ने मेरे भीतर वे संभावनाएँ पैदा कर दीं। मुम्बई आने के बाद 2004 से 2012 तक कोई काम नहीं था। मेरा कोई पीआर प्रबंधन नहीं था। मगर पटना के उस अखबार की उस पंक्ति से मुझे हमेशा लगा कि मेरे भीतर अवश्य ही संभावनाएँ होंगी, तभी यह लिखा गया है और आज मैं आपके सामने हूँ।

 

कोई बीज धरती के भीतर पड़ता है तो वह सोच सकता है कि वह कितने अंधेरे में दबा हुआ है। किन्तु वृक्ष के रूप में उसके विकास के लिए उसे यह धैर्यपूर्वक सहना ही है। धूप और पानी में रहते हुए ही वह अपने पूर्ण स्वरूप में एक दिन उभर ही आता है।

बिहार के हिंदी माध्यम के एक स्कूल से पढ़कर निकला हूँ। जीवन भर बिहारी लहजा मेरे साथ रहा है और वह मेरा माइनस प्वाइंट नहीं है। मैंने इसे अपनी ताकत समझा। अपनी जड़ और जमीन से जुड़े रहने के लिए यह जरूरी है। मैंने लोकप्रियता के इस दौर की कभी कल्पना नहीं की थी। परमात्मा ने पर्याप्त से अधिक दे दिया।

एक एक्टर के रूप में हम इमोशन की मजदूरी करते हैं। जो दुःख हमारा नहीं है, जो पीड़ा हमारी नहीं है। हम उस मनःस्थिति में रहते हैं और वैसा अभिनय करते हैं। कितना ही पीड़ादायी शोक समाचार मिला हो किन्तु कॉमेडी के रोल में रहकर हँसना और हँसाना ही है। इसलिए हमें योग करना आवश्यक है। वह हमें अपनी वास्तविकता में स्थिर और संतुलित बनाए रखता है।

मध्यप्रदेश एक फिल्म फ्रेंडली स्टेट है। हमने चंदेरी में बहुत आसानी से अपना काम किया। जहाँ लोगों ने बहुत दोस्ताना होकर सहयोग किया। उज्जैन के महाकाल मंदिर में और इंदौर की फूल मंडी में हर जगह एक अपनत्व भरे वातावरण में फिल्मों की शूटिंग की।

स्क्रीन हमारी कल्पनाशक्ति को खत्म कर रही है। किताब और रेडियो में यह क्षमता है कि हमारी सोचने की प्रक्रिया को सशक्त बनाए। एक किताब दो लोग पढ़ेंगे तो दो तरह से उनकी कल्पनाशक्ति सक्रिय होगी। स्क्रीन पर एक चाँद नजर आता है और हमें सोचने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। इसलिए विद्यार्थियों को मैं कहूँगा कि वे निरंतर किताबें पढ़ने की आदत डालें। राग दरबारी और काशी का अस्सी जैसी किताबें उन्हें बाँधकर रखेंगी।

पत्रकारिता और सिनेमा की दिशा में अग्रसर विद्यार्थियों को मेरा सुझाव है कि अपनी मौलिकता कभी न खोएँ। मौलिकता एक कम प्रयोग होने वाला शब्द है। क्या इसका अर्थ आप जानते हैं?“

दिमाग से ज्यादा ताकतवर मेमोरी कार्ड दूसरा नहीं है और आँखों से अधिक मेगा पिक्सल वाला कैमरा दूसरा नहीं है। इसलिए मेरे साथ तस्वीर खिंचवाने की बजाए दिमाग में अनुभव की इन अमूल्य बातों को याद रखें, इस दृश्य को अपने मस्तिष्क में अंकित करें।

हमारे यहाँ ऐसा मानते हैं कि एक पुरुष को भावनात्मक रूप से कभी कमजोर नहीं होना चाहिए। उसे कभी रोना नहीं चाहिए। मगर मैं स्टेज पर भी रो सकता हूँ। रोने से आप हल्के होते हैं। (ऐसा कहते हुए उन्होंने मार्च 2019 में प्रतिष्ठित हिंदी पत्रिका अहा जिन्दगीके कवरेज को याद किया। उनके पत्रकार मित्र चंडी प्रसाद शुक्ल ने यह कवरेज किया था। किन्तु चंडी प्रसाद जी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उन्हें याद कर पंकज त्रिपाठी की आँखें नम हो गईं। मनीष समंदर उन्हें यह विशेषांक भेंट करने विशेष रूप से आए।)“ 

संस्कृति विभाग के प्रमुख सचिव शिवशेखर शुक्ला को धन्यवाद कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में शामिल होने आए पंकज त्रिपाठी को हमारे एक छोटे से आग्रह पर वे सैंकड़ों विद्यार्थियों के बीच लेकर आए। डॉ आशीष जोशी इस सत्र के सूत्रधार बने।

 जीवन के कठोर अनुभवों से हम वह सीखते हैं जो कई साल की डिग्री नहीं सिखा सकती। किताबी ज्ञान अपनी जगह है और उसका अपना महत्व है। मगर सबके अनुभव सबके काम के हैं।

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विजय मनोहर तिवारी

कुलगुरू, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

भोपाल

 

न्यूज़ सोर्स : विजय मनोहर तिवारी