बदलते शहरी परिवेश और प्रकृति से दूर होते मानव की पीड़ा को मार्मिक ढंग से व्यक्त करती श्री राजेश कुमावत ने कविता गमलों पर गर्वित विश्वास अतीत के हरित, जीवंत और आत्मीय वातावरण की तुलना वर्तमान के कंक्रीट जंगल से करते हुए विकास के नाम पर हो रहे विनाश को उजागर किया है। वृक्षों के कटने और गमलों तक सिमटती हरियाली के माध्यम से प्रकृति के कृत्रिम होते स्वरूप पर प्रश्न उठाया है। यह रचना हमें चेताती है कि वास्तविक प्रगति वही है, जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे बढ़े। - सम्पादक

गमलों पर गर्वित विश्वास

-                                             राजेश कुमावत

हरित हृदय-सा था मेरा नगर नंदनवन-सा,

हर गली हरितिमा जैसे महलों का रनिवास॥1

नीम की नीरव छाया और बरगद की बाहें,

प्राण पीपल से पाकर करती पवन प्रवास॥2

सदियों के साक्षी वृक्ष खड़े संतों-से गंभीर,

रहा अभावों में मानव दिया न इनको त्रास॥3

धूल-धूसरित पथ थे, कीचड़ का था राज,

प्रसन्न चेहरों पर लेकिन अपनेपन का अहसास॥4

ऊबड़-खाबड़ गलियाँ, खड्डों का विस्तार,

फिर भी वन बचाए करके भावी का आभास॥5

चित्र विपर्यस्त अब सीमेंट श्रंगारित है सड़कें,

घटती सांसें घटता जीवन उन्नति का अट्टाहास॥6

विकास की वेदी पर देखा वृक्षों का विनाश,

हरित हृदय कराह उठा, सुन पारे का परिहास॥7

कटे पेड़ पुराने सब, गमलों पर गर्वित विश्वास,

धरती माँ की पीर का कौन करे अब अहसास॥8

नीम, पीपल, बरगद भूले, छूटा हरित निवास,

कांक्रीट जंगल देख इठलाता कृत्रिम विकास॥9

श्वांस-श्वांस मुझपे कर रही प्रश्नों की बौछार,

ऋतु पतझड़ ने रख लिया जैसे नाम मधुमास॥10

नीम हुए निर्वासित, बरगद हो गए इतिहास,

दुर्लभ दर्शन पीपल के मनुज मति का ह्रास॥11

दो फुट के गमलों में मान रहे हरित विस्तार,

पौधों संग फोटो ले करें प्रायोजित अखबार॥12

हर साल हरे-हरे रोपण, देखरेख भूलें ज्ञानी,

छपास की भूख और ये नेताई विन्यास॥13

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