व्यंग्य................. उड़न खटोले का उड़ना ........................... अरूण कुमार जैन
व्यंग्य.................
उड़न खटोले का उड़ना
- अरूण कुमार जैन
हमारे इतिहास में सबसे पहला उड़न खटोले का जिक्र जो जन जन तक पहुंचा , वह प्रभु श्रीराम का पुष्पक विमान का जिक्र था जब वह लंका अर्थात रावण विजय पश्चात् शीघ्रातिशीघ्र अयोध्या पहुंचने के लिए प्रयोग में लाया गया था। वास्तव में हमारे पूर्वज परमाणु की शक्ति और उससे चलने वाली मशीनों के बारे में गहन ज्ञान रखते थे। पुष्पक विमान का प्रोटोटाइप कैसे लंबी दूरी की यात्रा में ईंधन की खपत पर नियंत्रण रखेगा, यह बात पहले ही तय कर ली थी और उसी अनुरूप पुष्पक विमान एक मंत्र शक्ति से चलने वाला काष्ठ निर्मित विमान था जिसे मंत्र की शक्ति से काष्ठ में छुपे परमाणुओं को ऊर्जस्वित कर गंतव्य तक जाना तय किया गया था। तब राम राज्य में विमान विशेष प्रबंध का हिस्सा था और जनसामान्य के लिए ऐसी सुविधा अनुपलब्ध थी।
अब प्रजातंत्र है, सब राजा तथा प्रजा सभी को सभी सुविधाएं उपलब्ध है। प्रधानमंत्री जी ने उनके कार्यालय का नाम भी बदलकर सेवा भवन कर लिया है। राज्यपाल महामहिमों के आवास भी राज भवन से अब लोक भवन बन गए हैं। यद्यपि नाम बदलने से नजरिया बदलने की शुरुआत भर हो सकती है, भाव से अभाव कब बदलेगा, यह कह नहीं सकते। बहरहाल उम्मीद रखने में क्या जाता है ? भारतीय मानस उम्मीद पर, आशा पर चलता रहता है और थकता है, ठगा जाता है, रोता है, झींकता है, ताकत झोंकता है, हारता है, पर फिर भी हार नहीं मानता और नए नवाबों के, हुक्मरानों के नए नारों पर फिर भरोसा कर चल पड़ता है। उसे मालूम है चरैवेति….चरैवेति के उदघोष में जीवन छुपा है, चलते रहना है। आखिर कभी तो मंजिल मिलेगी, इसीलिए हमारे नेता कभी कभार ही सही पैदल यात्रा पर निकल पड़ते हैं। हालांकि तब भी वे जनता को भरमाना और सब्ज बाग दिखाना नहीं छोड़ते। आखिर आदत जाते - जाते ही जाएगी, पता नहीं सदबुद्धि कब आएगी ?
इधर पुतिन का भारत आगमन और शीर्ष नेतृत्व उनके साथ वार्ताओं में व्यस्त रहा और इधर भारतीय आकाश उड़न खटोलों से त्रस्त रहा। सिविल उड़ान नियंत्रण महानिदेशालय की सख्ती और जनता के प्रति जवाबदेही और सुरक्षा के चलते विमान परिचालन स्टाफ पर प्रति सप्ताह एक निश्चित घंटों के विश्राम का प्रतिबंध क्या लगाया, कतिपय विमान कंपनियों और कर्मचारियों को कमाई पर प्रतिबंध लगा और उन्होंने मिलकर एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया कि निरीह जनता में हलाकान मच गया। शादियों में जाने के लिए आतुर, व्यापारिक कार्य, सरकारी और असरकारी कार्य सब धरे के धरे रह गए। विमान परिचालन के स्टाफ की कमी पड़ गई और इस कमी ने अचानक उड़न खटोलों को खड़ा कर दिया। उन खटोलों की खाट खड़ी हो गई। विमानतल पर व्यवस्थाएं अव्यवस्थाओं में तब्दील हो गई। विमानपत्तन क्षेत्र भीड़ भरे सब्जी भाजी बाजार में बदल गए। सब तरह बेजार यात्रियों की टकराहट, उलझनें और विमान कंपनियों के काउंटर पर पूछताछ, अपने गंतव्य तक जाने की छटपटाहट, भूख और प्यास के मारे बुरे हाल, कोई बताने को तैयार नहीं कि कौन सी फ्लाइट जाएगी और कौन सी नहीं। पहले से आरक्षित विमान की सीट में एक अतिरिक्त सीट मुंह मांगे दामों पर खरीदने वालों की भीड़, मारा मारी, अफरा तफ़री और उस पर से अनिश्चितता। कोई होटल छोड़ आया है तो कोई विदेश से उतरा है। कौन - कौन महंगा टिकट खरीद सकता है....दस गुना दाम पर पूरे परिवार के साथ टिकट खरीदना हर किसी के बूते का नहीं। फिर रिफंड देने में कंपनी की आनाकानी, यह सब एक ही नाटक के हजारों लाखों पात्रों की कहानी की झलक भर है। छोटे बच्चों को लेकर सफर करनेवाली अकेली कामकाजी महिलाएं के तक आंसू छलक पड़े। नींद के मारे बिसुरते बच्चे, बैठे - बैठे अकड़ाए बुजुर्ग, टहलते हुए थके नौजवान, हारे हुए थके चेहरे जिस तरह उड़न खटोलों के बीच, दिवा स्वप्नों और विकास के बीच लटकते - अटकते इस बार देखे गए, वह कभी न दिखाई देने वाला मंजर है।
ऐसी दुर्दशा और ऐसी बदहाली, जैसे विभाजन या युद्ध विभीषिका के समय मची मारामारी के दृश्य उपस्थित थे और ऐसे समय विमान कंपनियों का बेहद खराब रुख, नैतिकता का परित्याग कर विशुद्ध धंधा, कालाबाजारी, मनमाने किराए वसूलने की छूट और खुली लूट। नियामक निदेशालय की सुस्ती ने इन्हें बेलगाम होने में और अवसर का लाभ उठाने में पूरा खुला छोड़ दिया लगता है। मंत्रिमंडल तक खबर पहुंचे और वह नियंत्रण निदेशालय से पूछे तब तक संबंधित को स्पष्टीकरण के लिए 24 घंटे दिए जा चुके थे। तब तक और कोई तात्कालिक निर्णय या कदम उठाने में महानिदेशालय अकर्मण्य साबित हुआ। आखिर कदम भारी होते हैं, उठते नहीं हैं, किसी महिला के जैसे पैर भारी होते हैं तब उससे जल्दी चलने के लिए नहीं कहा जा सकता और न ही अपेक्षा रखी जाती है। ऐसा ही कुछ कदमों के साथ हो गया। भारी कदम हो गए। न महानिदेशालय और न ही संबंधित मंत्रालय कुछ कर सका। जैसे सरकार में कुछ भी करने का कर्तव्य बस प्रधान और उनके एक दो खास का ही है, बाकी सब रबर की मोहरें या चिराग के जिन्न ही हैं जो घिसने पर ही,,,,, जो हुकुम मेरे आका ,,,,,,बोलते खड़े हो जाएंगे।
उड़न खटोलों का भाग्य और उनके भाग्य विधाता, यह नहीं देख रहे कि ग्राहक भगवान होता है। भारतीय रेल सेवा ने तत्काल कुछ नई रेल और प्रमुख मार्ग पर गंतव्य तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त बोगियों की तत्काल व्यवस्था कराई। सरकार की इमरजेंसी सेवाओं का प्रभाग विशेष स्थिति से निपटने के लिए तत्पर दिखाई दिया। मगर गैर जिम्मेदार और नाकारा विमान कंपनियों को सबक सिखाने और भविष्ट में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर खुली लूटमार की छूट की प्रवृत्ति पर भविष्य में रोक लगाए जाने का पक्का प्रबंध अब लाजिमी है।
उड़न खटोलों का उड़ना बहाल हो गया है। सारे विश्व में तहलका मच गया। भारतीय कंपनियों की गैर ज़िम्मेदाराना हरकतें सब तरफ निर्लज्जता की पराकाष्ठा का खेल सबने देख लिया। व्यावसायिकता की हद पार कर जाना, कई प्रश्न खड़े कर गया जिनके उत्तर अब विक्रम बेताल से पूछते दिखेंगे। नंगी तलवार लिए विक्रम घूम रहा है। किसी का सर नपना अवश्यंभावी है और ज़रूरी भी। आखिर एक स्वस्थ लोकतंत्र में चोरों और लुटेरों को सजा मिलनी ही चाहिए, भले ही वे कितने ही सफेदपोश क्यों न हों।
उड़न खटोलों को तय समय पर उड़ना और सही मानकों से सुरक्षा पर खरे उतरना होगा। नियंत्रक महानिदेशालय का विमान कंपनी के आगे झुकना या लंगड़ा कर चलना उसकी अपनी कमजोरी हो सकती है मगर यह यात्रियों के सुरक्षा के मुद्दे को ध्यान में रख उचित प्रतीत नहीं होता।
नागरिकों को चाहिए कि वे भी संयम दिखाएं और उड़न खटोलों का मोह थोड़े दिन कम कर लें, यद्यपि नियंत्रित किराए लागू कर मनमानी पर रोक लगाई गई है, तब भी भीड़ को नियंत्रण में लाना होगा और स्व अनुशासन रखना होगा। अब रामराज्य है नहीं जो वीर हनुमान अपने कंधों पर बिठाकर राम लखन को सुरक्षित पार लगा दें। जय श्री राम।
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अरुण कुमार जैन, इंदौर
व्यंग्यकार

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