व्यंग्य................. भोजन की लागत और बजट............................... अरूण जैन
व्यंग्य.................
भोजन की लागत और बजट
- अरूण जैन
अभी अभी समाचार पढ़ने में आया है कि वार्षिक आधार पर खाने का सूचकांक निकाला गया है और उसमें शाकाहारी थाली की लागत 17 प्रतिशत कम आंकी गई, जबकि मांसाहारी थाली की लागत 12 प्रतिशत कम आंकी गई। कितना भला लगता है यह पढ़ना और सुनना, एक आश्वस्ति भाव जगा देता है कि ट्रंप के टैरिफ के बावजूद हम महंगाई को चौतरफा विश्व में चल रहे युद्ध, तूफान और गड़बड़ी के बावजूद काबू में रखे हुए हैं, मुफ्त की लाडली लक्ष्मी और बहुत सी मुफ्तिया योजनाओं के बावजूद विकास को गले लगाए तरक्की कर रहे हैं।
इसका आधार आलू की कीमत में 31 प्रतिशत, टमाटर की कीमत में 40 प्रतिशत और प्याज के भाव में 51 प्रतिशत की वार्षिक गिरावट को माना गया। दालों की कीमत में आई गिरावट का पता भी मुझे इसी रिपोर्ट से पता लगा कि दालें वार्षिक आधार पर 17 प्रतिशत की दर से सस्ती हुई। इसमें उन्होंने पीले मटर और काले चने को शामिल किया है उसी आधार पर अपना निर्णय रिपोर्ट में रख दिया है। आश्चर्य है कि उन्हें लाल होती तुवर दाल या कूद फांद मचाती रही मांग में बनी मूंग दाल नहीं दिखाई दी। खूब तेज मंद होता कच्ची घानी का निकला मूंगफली तेल, सरसों तेल नजर नहीं आया, अचार में डलता तेल और तेल की तेज धार उन्हें दिखाई नहीं दी।
मैंने भोजनालय वाले को यह खबर बताई और वार्षिक आधार पर मेरी शाकाहारी थाली के 17 प्रतिशत दाम वापस किए जाने की ताकीद करते हुए अपना 17 प्रतिशत रिफंड क्लेम प्रस्तुत कर दिया। भोजनालय वाले ने सीधा नहीं कहा बल्कि रिफंड क्लेम की जांच हेतु समय लगने का दावा किया और उसके पश्चात दावा निपटान का आश्वासन दे दिया। मैं इस रिपोर्ट के आंकड़े से आश्वस्त हुआ और निश्चिंत हो गया कि 17 प्रतिशत पैसा बैंक अकाउंट में आना तय है।
इधर भोजनालय वाले ने अपने जांच अधिकारी नियुक्त कर दिए। उन्होंने अपनी रिपोर्ट एक सप्ताह में तैयार कर दी, वही रिपोर्ट भोजनालय वाले ने अपने हस्ताक्षर के साथ मेरी ओर भेज दी। मैंने भी उसका अध्ययन शुरू किया। सबसे पहले लिखा था कि आलू ,प्याज , टमाटर के रेट्स साल भर एक जैसे नहीं रहे अतः 17 प्रतिशत की गिरावट अमान्य की जानी चाहिए, दूसरे यह कि केवल इन तीनों और तेल मात्र से खाने की थाली तैयार नहीं होती, महंगी चतर फली और डेढ़ सौ रुपए किलो की सूरजने की फली। अन्य महंगी सब्जियां खा खाकर हम भी हतप्रभ हैं कि हरा धनिया इस बीच डेढ़ सौ रुपए की नई शीर्ष ऊंचाई प्राप्त कर गया। यह सब विचित्र सा लगता है कि देश की मंडियों में 20 रुपए किलो बिकने वाला हरा धनिया आज क्यों इतना ऊंचा चढ़ गया, माना हम चांद तक पहुंच गए उसका मतलब यह थोड़ी है कि हमारी सब्जियां, हमारी दालें, हमारे रोजमर्रा के सामान भी चांद के भाव तक ऊंचे पहुंच जाएं, नीचे भाव को न उतारिए और उस पर कुछ विदेशी स्वदेशी एजेंसी इस तरह वार्षिक आधार पर अपना विश्लेषण प्रस्तुत कर देती है। अब इसमें आम आदमी खो जाता है, मध्यमवर्गीय इसे कागजी घोड़ा बता देता है और उच्च वर्ग इसमें पूंजीगत लाभ हानि की बात करता है। राजनीतिक लोगों की अपनी अपनी गणना और अपना अपना राग है, जनता का बैराग कौन सुने ,उसे तो बस बैराग्य की याद आती है, सनातन धर्म अपनाओ और बाबा जी बन जाओ,न दीन की चिंता न दुनिया की।
आखिर नून, लकड़ी, ईंधन गैस, मसाले, नमक भी तैयार थाली का हिस्सा हैं फिर उनका हिस्सा कहां गायब कर दिया, उन्हें भी थाली की लागत में श्रम के साथ जोड़ा जाना चाहिए था। तब सही कीमत का आकलन होता। मतलब अब तो भोजनालय वाला भी फिरकी दे गया। उसने रिफंड क्लेम खारिज कर दिया।
इधर उधर की उधेड़बुन में घर पहुंच गया, पत्नी ने द्वार खोला, पानी का पूछा, पंखा चला दिया, शोर करने वाले पास पड़ोस के बच्चों को भगा दिया और चाय के साथ नाश्ता फौरन लगा दिया। माजरा कुछ समझ नहीं आया, अपने ही घर में मेहमानों, वह भी खास पीहर वालों सा, व्यवहार जो रोजमर्रा के जीवन में दुर्लक्षित है, देखने में आ गया। इतने में पत्नी ने हौले से मंद मुस्कुराहट जो सगाई की बाद और शादी से पहले जैसी थी, चेहरे पर लाते हुए, पुलकित सुस्मित होते हुए हमसे शाकाहारी थाली के वार्षिक लागत में आई कमी के बदले बचत के हिस्से से अपनी सोने के कड़े की मांग सामने रख दी, उसे कैसे समझाऊं कि इस कारपोरेट कल्चर के विश्लेषण ने भट्टा बिठा दिया है और इसी की आड़ लेकर सरकारें महंगाई भत्ता कम कर देंगी। घर वाली को सोने के कड़े नहीं बनवाए तो उसका अनशन, अंट शंट बोलने से शुरु होकर जाने कहां जाकर रुकेगा।
आम आदमी इसी सब में खोकर रह गया है, मध्यमवर्गीय पिस गया है, उच्च वर्ग को इसमें पूंजीगत खर्च की व्यवस्था नजर आने लगती है। राजनीतिज्ञ अपने अपने गणित में लगे हुए हैं, उनकी अपनी ढपली अपना राग है। मुफ्तिया घोषणाएं और उनके संरक्षण में जुटे हुए हैं। आम जनता को विकास के ख्वाब आते हैं।जीडीपी के आंकड़े और भविष्य के सपने वह देखता है और ताली बजाता रहता है।विश्व में अपनी रैंकिंग और ऊंचे उठते ग्राफ को देख हर्षाता है,पर इसके बावजूद वह समझ ही नहीं पाता है कि उसकी जेब क्यों सिकुड़ रही है। उसकी हंसी चिंता में तब्दील हो रही है फिर भी हम खुश दिखने और विश्व के खुशमिजाज लोगों की फेहरिस्त में अपने देश की रैंक ढूंढ रहे हैं।
अरुण कुमार जैन ।।
लेखक एवम् साहित्यकार

Tata की नई 'कन्वर्टिबल' कार ने मचाई खलबली! इतनी कम कीमत में कोई नहीं, जानें फीचर्स जो उड़ा देंगे होश
AIIMS Bhopal Hosts First-Ever Assistive Health Technology Hackathon to Transform Lives Through Innovation
साउथ अफ्रीका के खिलाफ टीम इंडिया बिखरी, 9 गेंदों में 5 विकेट गिरने का शर्मनाक रिकॉर्ड
UP में नया डिप्टी CM? पंकज सिंह समेत कई नामों पर सियासी चर्चा