व्यंग्य................. पानी दूषित या शुद्ध .......................... अरूण जैन
व्यंग्य.................
पानी दूषित या शुद्ध
- अरूण कुमार जैन
पानी एक जानदार चीज है, प्रकृति ने भरपूर दिया है, इंसानों ने इसे खूब जी भरकर पिया है। कभी चुल्लू से, कभी रामझारी से, कभी गिलास और लोटे से, कभी छोटे बर्तन से तो कभी सुराही से, कभी छोटी मटकी से तो कभी कांच के मर्तबान से, कभी बोतल बंद बोतल से तो कभी प्लास्टिक की बंद बोतल से। हर वक्त, हर जगह पानी एक, मगर उसके तरीके भिन्न - भिन्न, । उसके स्वाद भिन्न - भिन्न, उसकी क़ीमत अलग - अलग, उसकी तासीर भी अलग - अलग और उसके इस्तेमाल करने वाले भी अलग अलग।
तरह - तरह का पानी, तरह - तरह के लोग, तरह - तरह के उपभोग, सुबह उठने से रात में सोने तक और रात में जाग जाने पर भी नया उपयोग। पानी की महत्ता अपरंपार है । पानी की आवश्यकता असंदिग्ध है। रंग हीन, गंध हीन पानी हर रंग में रंग जाता है। हर गंध में बस जाता है। उसका स्वभाव ही अंतरराष्ट्रीय है। वह अंतरराज्यीय भी है। ,वह ग्राम पंचायत से लेकर नगर निगम तक है। वह हर जोन, हर गली मुहल्ले तक है और जन - जन की शिराओं में आबाद है। ,पानी खून की तरह हमारी आपकी रगों में खून के प्रमुख घटक की तरह दौड़ रहा है।
इधर भारत के स्वच्छतम शहर में पानी ने गंभीर रुप ले लिया है। नलों में से दूषित पानी वितरण होता रहा, व्यवस्था और प्रशासन सोता रहा। कुछ लोग बीमार पड़े तब तक लॉट साहबों की नींद नहीं खुली। फिर कुछ लोग सीरियस हो गए तब भी जिम्मेदार गैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार करते रहे और सीरियस नहीं । परंतु जब पानी सिर से ऊपर निकल गया, कुछ व्यक्ति काल के गाल में समा गए, तब हल्ला मचा । सब सीरियस हो गए। एक्शन मोड में आ गए। बड़ा गड़बड़ झाला हो गया। एक ही झटके में करीब 18 लोग मर गए। राष्ट्रीय अखबारों की सुर्खियां बन गई। न्यूज चैनल सक्रिय हो गए। प्रश्नों की झड़ी लग गई। सोए हुए सत्ता तंत्र के आधार हिल गए। फाइलें जाग गई। उठकर भागने की रफ्तार में आ गई। सरकारी मशीनरी जो ठप पड़ी थी, एकाएक हरकत में आ गई। मरने वालों के लिए फौरी तौर पर दो - दो लाख की सहायता घोषित हो गई। जांच कमेटी बैठा दी गई ताकि विपक्ष के विरोध की और जनता के रोश की आंच कुछ धीमी हो जाए। मारने के लिए उत्तरदाई लोगों पर आंच न आए, इसके इंतजाम हो जाएं। कुछ तबादले, कुछ के खिलाफ अनुशासन की कार्रवाई तज़बीज कर दी गई। एकाध को बलि का बकरा बना कर बर्खास्त कर दिया मगर जिनकी जानें चली गई, उनके चेहरे घूम रहे हैं और अब भी पूछ रहे हैं कि हमारा कसूर क्या था? यक्ष प्रश्न है कि महीनों यह सब चलता रहा और हम जिम्मेदार क्या करते रहे। छुटपुट तौर पर खबर आती रही मगर किसी ने इतना ध्यान नहीं दिया। अब सब घड़ियाली आंसू बहा रहे हैं। पानीदार आँखें होती तो सब देख लेती, समय रहते सब चेत लेती, मगर जहां आंख का पानी सूख गया हो, वहां सब बेमानी है। सत्ता का सत्य नंगा होता है और यह हादसा उसी का नंगापन उजागर कर गया। इंदौर का यह कौन सा दौर है, जहां स्वच्छता के ढेरों तमगे के पीछे की पोल खुल गई। अच्छा शहर, अच्छे और सीधे सादे लोगों का शहर, देवी अहिल्या का शहर, बाहरी अफसरों के भरोसे छोड़ दिया गया और जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोरने में लगे रहे। रोज के जाम, रोज के बढ़ते अपराध, शहर की हर सड़क खुदी हुई, विकास की परछाई में अपनी सूरत शक्ल भूल गई। यह कैसा विकास है। हम हर ओर पैमाने तय कर रहे हैं। रेकॉर्ड दर्ज कर रहे हैं मगर साफ पानी को तरस रहे हैं। मां नर्मदा का जल भगीरथ प्रयासों के बाद विंध्याचल पर्वत का सीना चीरकर न केवल निमाड़ से मालवा के पठार पर चढ़ा लाए वरन अपने समय में विश्व में सबसे दूर से पानी लाकर रेकॉर्ड होल्डर हो गए। होल्करों की जनधर्मिता का गौरव गान हमने जारी रखा । अपनी जनशक्ति के दम पर, आज हम उसी जन को भुला बैठे। उसके दर्द, उसकी पीड़ा को सर्द मौसम में हमने जमा दिया। भावना, सद्भावना सब आहत हुई, मगर एक दूसरे पर जिम्मेदारी ढोलने में सब लगे हुए हैं। मीडिया में मन बहलावे हो रहे हैं। जुमलों से जाने... कब हम बाज आएंगे, । जनता का सुख कब बांट पाएंगे ? महाकाल और ओंकार जी महाराज के बीच में बैठे हैं। पावन पुण्य सलिला गंगा के आह्वानकर्ता भागीरथ के पुण्य नाम पर बसे भागीरथपुरा का नाम दूषित जल कांड ने सदैव के लिए दूषित कर दिया। प्रदूषित जल ने जीवन की प्रत्याशा को धूमिल कर दिया। सैकड़ों की संख्या में लोग बीमार हो गए और आपातकालीन चिकित्सा ले रहे हैं। उच्च न्यायालय में जनहित याचिका लग गई,मगर जन हित कहीं दिखाई नहीं दे रहा।
इस विपदा के समय में न्यायालय शीर्ष प्रशासकों को बुला रहा है। विपत्ति का निदान करने में व्यस्त अधिकारी बदलते हालात का जायजा लेने में अपनी गोटी ठीक करने में लगे हैं। मानवाधिकार आयोग जाग गया है, । हादसे के बाद सब चौकन्ने हैं और अपने पहले के कर्त्तव्यों की अनदेखी और इकन्नी होने से किसी तरह बच निकलने की जुगत में जुगाड में व्यस्त हैं, जनता नए साल में पहले की तरह ध्वस्त है।
कवि रहीम ने बहुत पहले कहा था, जब सबका पानी उतर गया हो और सब्र का बांध टूट गया हो तब यही स्थिति होती है
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून ।
पानी गए न उबरे, मोती, मानस,चून।।
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अरूण कुमार जैन भारतीय राजस्व सेवा के वरिष्ठ अधिकारी रहे हैं । सहायक आयुक्त के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद इंदौर में निवास और सामयिक विषयों पर निरंतर लिख रहे हैं। व्यंग्य, कविताएं और लेखों के माध्यम से अपनी बात कहने की उनकी अलग शैली है जो पाठकों को पसंद आती है. arunkumarjain28@gmail.com

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