आपकी बात......... सोहन तुम भाग्यशाली थे वरना........ ................आलेख................ रंजन श्रीवास्तव
आपकी बात.........
सोहन तुम भाग्यशाली थे वरना........
- रंजन श्रीवास्तव
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इस घटना ने बहुत सारे गंभीर सवाल पुलिस और सरकार की व्यवस्था पर खड़े कर दिए हैं। दुर्भाग्य यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है जिसमें पुलिस ने किसी निर्दोष को जबरन आरोपी बनाया हो और उसके जीवन को हमेशा के लिए बर्बाद करने की कोशिश की हो। पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं, पर उन घटनाओं के “सोहन” इतने भाग्यशाली नहीं थे कि उनके विरुद्ध पुलिस द्वारा अपराध कारित करने का प्रमाण सीसीटीवी में कैद हो और अगर कैद भी हो तो पीड़ित के घरवाले उस मामले को न्यायालय में ले जाकर राहत की उम्मीद करें।
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सोहन की किस्मत उसके साथ थी। वह भाग्यशाली निकला कि जिस बस में वह यात्रा कर रहा था, उसमें सीसीटीवी कैमरा लगा हुआ था। सोहन इसलिए भी भाग्यशाली था क्योंकि बस में सीसीटीवी कैमरा कार्यशील स्थिति में था, नहीं तो मध्य प्रदेश में मंदसौर जिले की पुलिस द्वारा प्रताड़ित राजस्थान का 18 वर्षीय छात्र सोहन आज भी जेल में पड़ा सड़ रहा होता और पुलिस उसे अपराधी बताकर ट्रायल कोर्ट में चार्जशीट पेश कर चुकी होती।
कक्षा 12वीं में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण सोहन, जिसका सपना एक अधिकारी बनना है, वह अपने आपको निर्दोष साबित करने के लिए जेल और कोर्ट के बीच शटल कॉक की तरह घूम रहा होता और संभवतः इस दौरान वह जेल और पुलिस से परेशान तथा न्याय से वंचित होकर एक अपराधी बनकर निकलता।
और यह सब सिर्फ इसलिए होता क्योंकि मल्हारगढ़ पुलिस थाने के कुछ बेईमान पुलिस अधिकारी और जवान सोहन को अफीम के साथ गिरफ्तारी दिखाने के बाद उसे सजा दिलाने के लिए कमर कसकर खड़े हो जाते।
एक सीसीटीवी कैमरे ने सोहन का जीवन बचा लिया। पर ऐसा नहीं कि पुलिस की अंतरात्मा जग गई हो, बल्कि इसलिए कि परिवार वाले सीसीटीवी फुटेज लेकर हाई कोर्ट पहुंच गए, जबकि बिना किसी अपराध के सोहन जेल में बंद अपनी किस्मत को रो रहा था।
मंदसौर पुलिस ने तो शुरू में कोर्ट को मना ही कर दिया था कि जो लोग सीसीटीवी फुटेज में सादे कपड़ों में छात्र को ले जाते दिख रहे हैं, वे पुलिस के अधिकारी और जवान हैं। पर जिले के नए पुलिस अधीक्षक ने न्यायालय में यह स्वीकार किया कि वे मल्हारगढ़ थाने के पुलिस कर्मी हैं और सबके खिलाफ एक्शन लिया गया है।
हाई कोर्ट में याचिका के बाद मंदसौर जिले के पुलिस अधीक्षक को टीआई राजेंद्र पंवार सहित 6 पुलिसकर्मियों को निलंबित करना पड़ा, जिनमें सब-इंस्पेक्टर संजय प्रताप और साजिद मंत्री तथा कांस्टेबल नरेंद्र सिंह, जितेंद्र सिंह और दिलीप जाट शामिल हैं।
पर क्या सोहन को न्याय मिल गया? क्या पुलिस द्वारा इस छात्र को अफीम रखने के जुर्म में आरोपी बनाए जाने, टॉर्चर किए जाने और जेल भेजे जाने से हुई मानसिक तथा शारीरिक प्रताड़ना की क्षतिपूर्ति वाकई संभव है?
इस घटना ने बहुत सारे गंभीर सवाल पुलिस और सरकार की व्यवस्था पर खड़े कर दिए हैं। दुर्भाग्य यह है कि यह कोई पहली घटना नहीं है जिसमें पुलिस ने अपराध कारित करके किसी निर्दोष को जबरन आरोपी बनाया हो और उसके जीवन को हमेशा के लिए बर्बाद करने की कोशिश की हो। पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं, पर उन घटनाओं के “सोहन” इतने भाग्यशाली नहीं थे कि उनके विरुद्ध पुलिस द्वारा अपराध कारित करने का प्रमाण सीसीटीवी में कैद हो और अगर कैद भी हो तो पीड़ित के घरवाले उस मामले को न्यायालय में ले जाकर राहत की उम्मीद करें।
यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यह उस पुलिस थाने की कारस्तानी है जिसे देश के नवें सबसे अच्छे थाने का तमगा मिला हुआ था। अगर देश के सबसे अच्छे थानों में से एक इस थाने का यह हाल है तो जो थाने अच्छे नहीं माने जाते हैं, उनका क्या हाल होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
पुलिस की खराब कार्यप्रणाली और इस विभाग में भारी भ्रष्टाचार के मामले समय-समय पर सामने आते रहते हैं। पर न तो सरकार को चिंता इस विभाग को दुरुस्त करने की और न अधिकारियों को। “यह सब चलता है” की स्टाइल में सभी आंखें मूंदे बैठे हैं।
पुलिस रिफॉर्म्स की बातें होती जरूर हैं, पर रिफॉर्म कोई करता नहीं। राजनीतिक दल विपक्ष में रहने के दौरान जोर-शोर से पुलिस सुधार की बातें करते हैं पर सत्ता मिलते ही उनकी पहली कोशिश होती है कि चलते हुए ढर्रे को बदला नहीं जाए, बल्कि कैसे पुलिस का दुरुपयोग करके विपक्ष पर शिकंजा कसा जाए।
अपने कैरियर के अंतिम दिनों में पुलिस महानिदेशक और अन्य अधिकारी भी पुलिस व्यवस्था में कोई आमूल-चूल परिवर्तन करने से बचते हैं। शायद वे भी जानते हैं कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने की बात सोचना भी बेमानी है, करने की बात तो दूर रही। गाहे-बगाहे कुछ निर्देश या चेतावनी जारी करके कर्मकांड की इतिश्री कर ली जाती है और समाज में ऐसे कई सोहन पुलिस थानों द्वारा जीवन भर के लिए अपराधी बना दिए जाते हैं और उनके भविष्य को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाता है।
जब तक पुलिस विभाग में प्रभावी “चेक्स एंड बैलेंस” स्थापित नहीं होगा और सुपरवाइजरी रोल मजबूत नहीं होगा, तब तक ऐसे सोहन पुलिस थानों द्वारा आरोपी और अपराधी बनाए जाते रहेंगे।
देखने में डीजीपी से लेकर डीएसपी तक एक मजबूत सिस्टम है सुपरवाइजरी रोल और नीचे के स्तर पर पुलिस की वर्किंग को मॉनिटरिंग करने के लिए तथा निर्दोषों को बचाने के लिए भी, पर इस सिस्टम में कुछ गिने-चुने अधिकारी ही अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं। शेष इस व्यवस्था को अपने हितों हेतु पोषित और पल्लवित करते रहते हैं। मंदसौर के एसपी ने भी पुलिस वालों के खिलाफ एक्शन तभी लिया जब पीड़ित छात्र के परिवार वाले उच्च न्यायालय न्याय मांगने पहुंचे।
आज जब मध्य प्रदेश की विधान सभा ने अभ्युदय मध्य प्रदेश को लेकर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया, क्या इस गंभीर घटना के बाद हम उम्मीद कर सकते हैं कि मध्य प्रदेश सरकार और पुलिस में डीजीपी से लेकर एसपी तक जो भी इस सिस्टम की चेन की कड़ी हैं, सोहन और उसके परिवार से हाथ जोड़कर माफी मांगें और यह संकल्प लें कि दूसरा कोई भी छात्र या कोई भी निर्दोष व्यक्ति सोहन की तरह पुलिस द्वारा प्रताड़ित नहीं किया जाएगा। अपराधी पुलिसकर्मियों पर ऐसा एक्शन लिया जाएगा जो अन्य पुलिसकर्मियों के लिए प्रदेश ही नहीं पूरे देश में नजीर बनेगा? यह एक ज्वलंत सवाल है, पर इसका जवाब भी पता है। ऐसा नहीं होगा।
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श्री रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं। अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स और फ्री प्रेस, भोपाल के साथ अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में ब्यूरो प्रमुख और वरिष्ठ पत्रकार के रूप में अपनी सेवाएं देने के बाद इन दिनों भोपाल में निवास और सामयिक मुद्दों व राजनीति पर नियमित स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। सम्पर्क.. 94253-51688, ईमेल - ranjansrivastava1@gmail.com

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