शुभ प्रभात –    ....... आज का चिंतन

निभाना

  • संजय अग्रवाल

जब हम किसी के साथ रिश्तों की खातिर उसके अनचाहे व्यवहार या अप्रिय बातों को सहन कर लेते हैं तो उसे निभाना कहते हैं क्योंकि हम  रिश्तों को खोना नहीं चाहते।

 सामंजस्य के प्रयास

पहले तो हमारी कोशिश यही होती है कि हम बातचीत द्वारा अपनी इच्छाएं और अपने मन की भावनाएं बता दें, उन्हें समझा दें जिससे उनकी बातचीत और व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन हो जाए। किंतु, इसके बाद भी यदि कोई परिवर्तन नहीं होता है तो हम बेमन ही सही, उनके अनुचित व्यवहार या बातों को बर्दाश्त कर लेते हैं।

मन पर प्रभाव

क्योंकि हमने उनके गलत व्यवहार को बर्दाश्त किया है और उनकी प्रकृति को सहज स्वीकार नहीं किया है, इसलिए हमारे मन में अंदर ही अंदर उनके प्रति क्रोध या अप्रियता का भाव निरंतर बना रहता है। और इस तरह हम रिश्तों को ऊपरी तौर पर तो निभा लेते हैं, लेकिन असलियत में हमारे ऐसे रिश्ते अर्थात् बेमन निभाते चले जाने वाले रिश्ते लगातार कमजोर होते चले जाते हैं।

क्या करें

हमें यह स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा कि दूसरों पर हमारा नियंत्रण कतई नहीं होता है और इसलिए उनकी स्वाभाविक प्रकृति को जान लेने के बाद हम उसको सहज में स्वीकार कर लें, यही एकमात्र उपाय होता है। यहां पर एक बात विशेष रूप से ध्यान देने की है कि किसी के गलत व्यवहार से हम अपने मन को प्रभावित नहीं होने देंगे। और ऐसा कर पाना पूरी तरह हमारे नियंत्रण में होता है।

मुझे जांचना होगा कि अपने रिश्तों में मेरी सहज स्वीकार्यता है या सहन करने और निभाते चले जाने की भावना है?                                                       ****************

https://dailynewshub.net/ws/dailynewshubnet/news/202411/Agrawal_Sanjay_IT_-_Copy-8.jpg

श्री संजय अग्रवाल आयकर विभागनागपुर में संयुक्त आयकर आयुक्त हैं. वे हमेशा लोगों से सम्पर्क और संवाद करने के लिये इच्छुक रहते हैं इसीलिए वे संपर्कसंवाद और सृजन में सबसे अधिक विश्वास करते हैं।  मानवीय मूल्यों और सम्बंधों के सूक्ष्म विश्लेषण के चितेरे श्री अग्रवाल "आज का चिंतन" नियमित रूप से लिख रहे हैं