शुभ प्रभात ..... आज का चिंतन

समझना, कि समझाना

  • संजय अग्रवाल

हमारा मन हमेशा चाहता है कि दूसरा हमारी हरेक बात को समझे, हमारी सभी भावनाओं को समझे और सदैव हमारे अनुकूल व्यवहार करे। लेकिन ऐसा पूरी तरह कभी नहीं होता और हो भी नहीं सकता।

व्यवहार

हर व्यक्ति की पृष्ठभूमि अलग-अलग होती है और इसीलिए उसकी सोच और समझ, उसका दृष्टिकोण और उसका व्यवहार भी अलग-अलग होता है। उसके व्यवहार या बातों में जब भी कभी कुछ हमारे अनुकूल नहीं होता है तो हम उसे समझाने का भरसक प्रयास करते हैं कि वह वैसा ना करे, बल्कि ऐसा करे। कई बार तो वह अपने अंदर परिवर्तन ले भी आता है, किंतु कई बार वह अपने अंदर हमारी इच्छा अनुसार परिवर्तन नहीं ला पाता है। शायद ला भी नहीं सकता क्योंकि यह उसकी स्वाभाविक प्रकृति के प्रतिकूल होता है। इस मूल सिद्धांत को हमें अच्छी तरह से समझ लेना होगा।

समझ की बात

यदि इतनी गहरी समझ हमारे अंदर जाती है तो हम दूसरे की स्वाभाविक प्रकृति को सहज ही स्वीकार कर लेंगे और उसे समझाना छोड़ देंगे और अपने मन पर भी उसका कोई खराब प्रभाव होने नहीं देंगे।

 

बदलाव

दूसरों में बदलाव ला पाना आसान नहीं होता बल्कि यह असंभव होता है और यदि कोई बदलाव उसमें आता है तो वह उसके स्वयं के भीतर से आता है। अर्थात् जब तक उसकी स्वयं की समझ और इच्छा स्वयं को बदलने की ना हो जाए तब तक उसके व्यवहार या बातों में कोई भी  बदलाव संभव नहीं है।

अतः यदि हम दूसरों में पूरा बदलाव लाने की अपेक्षा उसके नजरिए को समझ पाएं और हम स्वयं में संपूर्ण आत्मविश्वास और संतोष की भावना ले आएं तो तो ही हम सुखी हो सकते हैं। अन्यथा, हमारे अंदर व्यर्थ ही दु: की भावना क्रोध की भावना सदैव बनी रहेगी। हमारी प्राथमिकता स्वयं के जीवन के लिए होनी चाहिए ना कि दूसरों को बदलने के लिए।

 

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श्री संजय अग्रवाल आयकर विभागनागपुर में संयुक्त आयकर आयुक्त हैं. वे हमेशा लोगों से सम्पर्क और संवाद करने के लिये इच्छुक रहते हैं इसीलिए वे संपर्कसंवाद और सृजन में सबसे अधिक विश्वास करते हैं।  मानवीय मूल्यों और सम्बंधों के सूक्ष्म विश्लेषण के चितेरे श्री अग्रवाल "आज का चिंतन" नियमित रूप से लिख रहे हैं