विश्व रेबीज दिवस......... रेबीज पर करें चिंता और चिंतन.............................. आलेख... ओंकार कोसे
विश्व रेबीज दिवस.........
रेबीज पर करें चिंता और चिंतन
- ओंकार कोसे
विश्व रेबीज दिवस लुई पाश्चर की पुण्यतिथि 28 सितंबर पर मनाया जाता है, जिन्होंने रेबीज का पहला टीका 1885 में विकसित किया था, और इस दिन का उद्देश्य रेबीज की रोकथाम के बारे में वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ाना है।
रेबीज (Rabies) एक घातक वायरल बीमारी है जो संक्रमित जानवरों की लार से, आमतौर पर उनके काटने या खरोंचने से फैलती है। यह वायरस केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करता है, जिससे मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में सूजन हो जाती है। यदि किसी व्यक्ति में रेबीज के लक्षण दिखने लगते हैं, तो यह लगभग हमेशा जानलेवा होती है। इस बीमारी से बचने के लिए, किसी संक्रमित जानवर के काटने या खरोंचने के बाद तुरंत घाव को साबुन और पानी से धोना चाहिए और जल्द से जल्द रेबीज का टीका लगवाना चाहिए।
विश्व रेबीज दिवस के अवसर पर रेबीज की चिंता एवं चिंतन करें क्योंकि रोकथाम ही एकमात्र उपाय है।
यह कैसे फैलता है ?
जानवरों का काटना: रेबीज से संक्रमित जानवर की लार से मनुष्यों में वायरस फैलता है, खासकर काटने या खरोंच के माध्यम से भी।
संक्रमित जानवरों के समूह: चमगादड़, लोमड़ी, रैकून, स्कंक और मवेशी जैसे स्तनधारी जानवरों में यह बीमारी पाई जाती है। विकासशील देशों में, आवारा कुत्तों द्वारा यह बीमारी फैलने की संभावना ज़्यादा होती है। विकसित देशों ने आवारा कुत्तों पर कड़ाई से प्रतिबंध लगा दिया है। वहां नगरीय क्षेत्रों में वे नहीं पाए जाते हैं, जो पाए भी जाते हैं उनको पकड़कर अनिवार्य रूप से उनका टीकाकरण करवा दिया जाता है जिससे वहां इस बीमारी के फैलने के संभावना नगण्य होती है।
भारत के किसी न किसी शहर से प्रतिदिन आवारा कुत्तों के काटने के बेहद हैरान कर देने वाली घटनाओं की सूचना आए दिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों के माध्यम से दिखाई पड़ती है।
रेबीज लगभग हमेशा घातक होता है क्योंकि केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर हमला करने के बाद इसके कोई प्रभावी इलाज नहीं होता हैं। इसका अर्थ है कि लक्षण दिखने के बाद जीवित रहना लगभग असंभव होता है और बेहद दर्दनाक मौत होती हैं। हालांकि, लक्षणों के दिखने से पहले, रेबीज का टीका लगवाने से संक्रमण को रोका जा सकता है।
घातकता का कारण
तंत्रिका तंत्र पर हमला: रेबीज वायरस दिमाग और रीढ़ की हड्डी पर हमला करता है, जिससे मस्तिष्क में गंभीर सूजन हो जाती है।
प्रभावी इलाज का अभाव: एक बार जब रेबीज के लक्षण दिखाई देने लगते हैं, तो इस बीमारी का कोई प्रभावी इलाज नहीं है, जिससे लगभग हमेशा मृत्यु हो जाती है।
रोकथाम ही एकमात्र उपाय-
टीकाकरण: लक्षण दिखने से पहले रेबीज का टीका लगाना संक्रमण को रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।
तत्काल चिकित्सा: किसी भी संक्रमित जानवर के काटने के बाद तत्काल चिकित्सा सहायता लेना और टीके के साथ-साथ रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) (यदि आवश्यक हो) प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है।
विश्व में मृत्यु दर-
दुनिया भर में, हर साल रेबीज से लगभग 59,000 लोगों की मौत होती है।
बच्चों को रेबीज संक्रमण का विशेष जोखिम होता है, क्योंकि संक्रमित जानवरों के काटने से 40% से अधिक मामले 15 साल से कम उम्र के बच्चों के होते हैं।
बेहद घातक है रेबीज-
एक बार रेबीज के लक्षण दिखना शुरू हो जाने पर इसका कोई प्रभावी इलाज नहीं है। रेबीज के संपर्क में आने के तुरंत बाद टीके लगवाना और एंटीबॉडी का उपचार ही इसे फैलने से रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि वायरस के लक्षण प्रकट हो जाते हैं, तो यह लगभग हमेशा घातक होता है।
रेबीज़ से बचाव के लिए क्या करें-
तत्काल चिकित्सा सहायता लें: यदि आपको लगता है कि आप किसी रेबीज़-संक्रमित जानवर के संपर्क में आए हैं, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
घाव की सफाई करें: संपर्क में आने वाले घाव को साबुन और पानी से अच्छी तरह धोएं।
टीके और एंटीबॉडी: डॉक्टर रेबीज के संपर्क में आने के तुरंत बाद टीके और रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (एंटीबॉडी) देंगे, जो वायरस को शरीर में फैलने से रोकते हैं।
यह उपाय जरूर करें -
लक्षण दिखने से पहले बचाव ही एकमात्र प्रभावी उपाय है।
रेबीज का कोई इलाज नहीं है जो लक्षणों के दिखने के बाद इसे ठीक कर सके।
मनुष्य में रेबीज का संक्रमण हो गया कैसे पता करें?
रेबीज का पता लगाने के लिए लक्षणों, जोखिम और प्रयोगशाला परीक्षणों का उपयोग किया जाता है, लेकिन मनुष्यों में इसके निदान के लिए सबसे सटीक तरीका लार, रक्त और त्वचा बायोप्सी के नमूनों का प्रयोगशाला में परीक्षण करना है। जानवरों में, इसके निदान के लिए अक्सर उनके मस्तिष्क के ऊतकों पर प्रत्यक्ष फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी परीक्षण किया जाता है।
मनुष्यों में निदान के तरीके-
लक्षणों का अवलोकन: शुरुआती लक्षणों में सिरदर्द, बुखार, इंजेक्शन वाली जगह पर खुजली या दर्द शामिल हो सकते है। बाद के चरणों में चिंता, आक्रामकता, गले की ऐंठन, हाइड्रोफोबिया (पानी से डरना), और लकवा जैसी गंभीर स्थितियां विकसित होती हैं।
प्रयोगशाला परीक्षण-
त्वचा बायोप्सी: गर्दन के पिछले हिस्से से ली गई त्वचा के नमूने की माइक्रोस्कोप में जांच करके वायरस का पता लगाया जाता है।
लार का नमूना: लार के नमूनों की जांच करके भी वायरस की पहचान की जा सकती है।
रक्त परीक्षण: रेबीज से जुड़े एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए रक्त के नमूनों का भी उपयोग किया जा सकता है।
रीढ़ की हड्डी का तरल पदार्थ (सीएसएफ) परीक्षण: सीएसएफ में रेबीज वायरस एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए भी यह परीक्षण किया जा सकता है।
जानवरों में निदान के तरीके-
प्रत्यक्ष फ्लोरोसेंट एंटीबॉडी परीक्षण (एफएटी): यह जानवरों में रेबीज का निदान करने के लिए सबसे व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला परीक्षण है, जो मस्तिष्क के ऊतकों पर किया जाता है।
व्यवहार संबंधी जांच: संक्रमित जानवर के व्यवहार में बदलाव को देखा जा सकता है।
अदालत ने लिया स्वतः संज्ञान-
सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों के संबंध में कहा है कि पकड़े गए आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण किया जाएगा और फिर उन्हें वहीं वापस छोड़ दिया जाएगा, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। हालांकि, आक्रामक या रेबीज से संक्रमित कुत्तों को शेल्टर होम में रखा जाएगा। कोर्ट ने नगर निकायों को सार्वजनिक स्थानों पर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने के लिए समर्पित फीडिंग पॉइंट बनाने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, कोर्ट ने राष्ट्रीय स्तर पर इस समस्या से निपटने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी कर आठ सप्ताह में अनुपालन रिपोर्ट मांगी है। उसके बाद इस गंभीर समस्या पर अपना अंतिम फैसला सुनाएगी।
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श्री ओंकार कोसे पश्चिम रेलवे के रतलाम मंडल, मुख्यालय रतलाम में राजभाषा विभाग में पदस्थ थे। सेवानिवृत्ति के पश्चात भोपाल में निवास। हिंदी के प्रचार – प्रसार के लिए सतत प्रयत्नशील श्री कोसे सम सामयिक विषयों पर भी अपनी कलम चलाते हैं।

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