30 करोड़ साल पुरानी दुनिया का खुलासा

         झारखंड की खुली कोयला खदानों से वैज्ञानिकों को एक ऐसी दुनिया के सबूत मिले हैं, जो इंसानों और डायनासोरों से भी करोड़ों साल पहले मौजूद थी। करीब 30 करोड़ वर्ष पहले यहां घने दलदली जंगल, बहती नदियां और कभी-कभी समुद्र का असर भी था। यह इलाका उस समय विशाल दक्षिणी महाद्वीप गोंडवानालैंड का हिस्सा था।

        यह महत्वपूर्ण खोज बीरबल साहनी जीवाश्म विज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में की गई। अध्ययन झारखंड के उत्तरी करणपुरा बेसिन स्थित अशोका कोयला खदान में किया गया।

मिले प्राचीन पौधों के दुर्लभ जीवाश्म

      खदान से प्राचीन पौधों के कई जीवाश्म मिले हैं। इनमें ग्लॉसॉप्टेरिस नामक विलुप्त बीज पौधे के अवशेष प्रमुख हैं। यह पौधा कभी दक्षिणी महाद्वीपों पर व्यापक रूप से पाया जाता था। वैज्ञानिकों को इसकी कम से कम 14 अलग-अलग प्रजातियों के पत्तों, जड़ों, बीजाणुओं और पराग कणों के निशान मिले हैं।

       दामोदर बेसिन में पहली बार ग्लॉसॉप्टेरिस के किशोर नर शंकु (male cone) का जीवाश्म भी मिला है, जिसे वैश्विक स्तर पर बड़ी खोज माना जा रहा है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ये प्राचीन पौधे कैसे विकसित हुए।

समुद्र के आने के भी मिले संकेत

        सूक्ष्मदर्शी जांच में कोयले और शेल चट्टानों में फ्रैम्बोइडल पाइराइट (रास्पबेरी जैसे आकार का खनिज) और अधिक मात्रा में सल्फर पाया गया। यह संकेत देता है कि उस समय यहां खारे पानी का प्रभाव था। यानी कभी-कभी समुद्र का पानी इस क्षेत्र तक पहुंचा करता था।

      रासायनिक विश्लेषण से यह भी पता चला कि लगभग 28 से 29 करोड़ वर्ष पहले दामोदर बेसिन में समुद्री जीवों का प्रवेश संभव था। इससे यह अनुमान लगाया जा रहा है कि पर्मियन काल में समुद्र पूर्वोत्तर भारत से मध्य भारत की ओर बढ़ा होगा।

आज के जलवायु परिवर्तन से जुड़ा संकेत

       यह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका International Journal of Coal Geology में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राचीन समुद्री अतिक्रमण और आज के बढ़ते समुद्र स्तर के बीच समानताएं देखी जा सकती हैं। यह अध्ययन बताता है कि जलवायु परिवर्तन और समुद्र स्तर में वृद्धि से महाद्वीपीय भूभाग कैसे बदल सकते हैं। झारखंड की कोयला खदानों से मिली यह खोज न केवल भारत के प्राचीन इतिहास को उजागर करती है, बल्कि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने में भी मदद कर सकती है।