आप पार्टी के नेताओं का बरी होना ...............नज़रिया …. .. ...........अरूण कुमार जैन
नज़रिया ….
आप पार्टी के नेताओं का बरी होना
- अरूण कुमार जैन
हाल ही में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट के फैसले में कोर्ट ने सीबीआई द्वारा दर्ज प्रकरण को विभिन्न कारणों से मान्य नहीं करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया सहित कुल तेईस को डिस्चार्ज करते हुए जांच एजेंसी के द्वारा प्रस्तुत चार्ज शीट पर बेहद अहम प्रश्न खड़े किए हैं। कहना न होगा कि जांच एजेंसी ने विभिन्न सूत्रों को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं करते हुए कहीं न कहीं खामी छोड़ दी जिसका लाभ अभियुक्तों को देते हुए न्यायालय ने उन्हें बरी कर दिया है। न्यायालय का निर्णय तकनीकी आधार का ज्यादा है बनिस्बत ठोस आधारों के, यह बात इससे भी साबित होती है कि यदि प्रकरण नहीं था तब केजरीवाल 156 दिन और सिसोदिया 530 दिन तथा अन्य आरोपी भी महीनों जेल में न्यायालय के आदेश पर कैसे जेल में रहे ?
सीबीआई उक्त अधीनस्थ न्यायालय के आदेश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय पहुंच गई है, अतः वाद अभी न्यायालय के समक्ष लंबित होने के कारण इस पर ज्यादा टिप्पणी किया जाना उचित नहीं है। तथापि कुछ बातें जो आम आदमी के दिमाग में उठती है, उन पर उच्च न्यायालय को आगे खुलासा करना भी न्यायिक स्पष्टता के लिए बेहद अहम और जरूरी हो जाता है।
निर्णय में जो बात सामने आई है, उनमें यह अहम है कि अभियुक्तों के स्वीकारोक्ति बयान नहीं है, जब इसी न्यायालय ने अभियुक्तों को जेल में रखने के दौरान बहुत से प्रतिबंध लगा दिए थे जैसे कि प्रतिदिन की पड़ताल या जांच सीसीटीवी कैमरे के सामने होगी, प्रतिदिन इन्हें इनकी पत्नियों से मिलने दिया जाएगा, प्रतिदिन शाम को इनके वकीलों की इनसे मुलाकात करने का समय दिया जाएगा। इन सब बातों के चलते यह उम्मीद भारतीय न्याय व्यवस्था में बेमानी है कि अभियुक्त कभी उस पर लगाए हुए आरोपों के पक्ष में स्वीकारोक्ति बयान देगा। जबकि सामान्यतया एक सामान्य कैदी को कोई भी न्यायालय ऐसी सुविधा नहीं देता। मतलब यह स्पष्ट है कि अभियुक्तों की विशेष परिस्थिति और राजनैतिक रसूख या विधायिका का हिस्सा होकर मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री पद पर रहने के कारण यह विशेष व्यवस्था दी गई, जबकि कानून की नजर में सब समान है। ध्यान रहे न्याय की देवी अब अंधी नहीं रही। क्या ऐसी विशेष व्यवस्था से एक आम नागरिक या अभियुक्त का मन लहूलुहान नहीं हुआ। क्या इससे आम आदमी की नजर में न्यायपालिका का गौरव बढ़ा।
लंबे समय कैद में रहने के बाद अचानक क्या मोड़ आया कि इन्हें रिहा किया गया। यह तो न्यायालय का अपना अधिकार है, मगर न्याय करना ही पर्याप्त नहीं है। यह दिखना भी चाहिए कि वास्तव में न्याय हुआ है तभी न्यायालयीन गरिमा बढ़ेगी और अक्षुण्ण रहेगी।
आम आदमी पार्टी के इन दिग्गजों को सजा दिल्ली शराब घोटाले में हुई थी, जिसमें गलत तरीके से दिल्ली शासन के खजाने को गहरा नुकसान पहुंचाना और शराब निर्माता कंपनियों को मुनाफे में दस गुना तक फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से आपराधिक षड्यंत्र के तहत पुरानी शराब विक्रय नीति को परिवर्तित करते हुए नई शराब विक्रय नीति को अपनाना था। इन गंभीर आरोपों के पीछे ठोस कारण और सबूत थे, यह बहुत पहले ही देश के समक्ष आ चुका है।
अभी केवल सीबीआई प्रकरण में ही सुनवाई हुई है। अभी ई.डी. का प्रकरण लंबित है। निश्चित रूप से सीबीआई नामक जांच एजेंसी के मुकाबले ई.डी. को ज्यादा शक्ति और अधिकार संपन्न बनाया गया है और ई.डी. की फौज बहुत अधिक प्रशिक्षित और साधनों से लैस है। तब उच्च न्यायालय का निर्णय बेहद अहम है और उसका फैसला आना अभी बाकी है। अतः आप के नेताओं द्वारा राजनीतिक फायदे के लिए जिस तरह से नाटक किया जा रहा है और जिस विजय जुलूस का आभास कराया जा रहा है वह छद्म ही साबित होगा। आखिर दोषियों के विरुद्ध अपराध सिद्ध होना, न्यायालयीन आदेश मुद्दों पर आधारित होकर अपराधियों को सजा मिलना ही न्याय की समुचित जीत होगी और जनता के पैसे के खुले दुरुपयोग करने वाले राजनेताओं को एक अहम सबक मिल पाएगा, भारतीय लोकतंत्र के लिए यह मील का पत्थर बनेगा।
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अरुण कुमार जैन , इंदौर
लेखक एवं स्वतंत्र विश्लेषक

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