मध्यप्रदेश में देश की सबसे लंबी जल सुरंग !

कटनी। मध्यप्रदेश के कटनी जिले के स्लीमनाबाद क्षेत्र में निर्मित लगभग 12 किलोमीटर लंबी जल सुरंग (वाटर टनल) अपने अंतिम चरण में पहुंच गई है। विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में इसे देश की सबसे लंबी जल सुरंग बताया जा रहा है। यह सुरंग नर्मदा घाटी विकास परियोजना की महत्वाकांक्षी कड़ी है, जिसके माध्यम से पहली बार नर्मदा का जल विंध्य क्षेत्र के कटनी, सतना, मैहर, रीवा और पन्ना जिलों के खेतों तथा पेयजल स्रोतों को नई जीवनरेखा प्रदान करेगा।

सुरंग के निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि विंध्य क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद अनेक स्थानों पर जल संकट का सामना करता रहा है। स्लीमनाबाद जल सुरंग इस समस्या के समाधान की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि परियोजना के लिए लगभग 1,600 करोड़ रुपये की लागत स्वीकृत हुई, जिसमें केंद्र सरकार ने लगभग 275 करोड़ रुपये का सहयोग दिया है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति आभार भी व्यक्त किया।

विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना नर्मदा के जल को सुरंग के माध्यम से सोन नदी तंत्र तक पहुंचाने का अनूठा उदाहरण है। इससे पहली बार नर्मदा का पानी गंगा बेसिन के हिस्से में पहुंचेगा, जिससे विंध्य और बघेलखंड क्षेत्र में सिंचाई और पेयजल की स्थिति में व्यापक सुधार होने की संभावना है। परियोजना के कुछ हिस्सों में जलविद्युत उत्पादन की भी व्यवस्था की गई है।

परियोजना के पूर्ण होने पर लगभग 2.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई क्षमता विकसित होगी। आगामी तीन माह में रबी सीजन के लिए लगभग एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई हेतु पानी उपलब्ध कराने की तैयारी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार सोन कछार परियोजना के अंतर्गत 152 क्यूसेक (क्यूबिक फीट प्रति सेकंड) डिस्चार्ज के आधार पर सतना जिले के 1,04,970 हेक्टेयर, मैहर के 54,227 हेक्टेयर, कटनी के 21,823 हेक्टेयर, रीवा के 3,532 हेक्टेयर तथा पन्ना के 448 हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचाई सुविधा मिलेगी। इसके साथ ही नहर नेटवर्क का निर्माण भी तेजी से किया जा रहा है।

इंजीनियरों के अनुसार यह सुरंग तकनीकी दृष्टि से देश की सबसे जटिल जल परियोजनाओं में शामिल है। कई स्थानों पर इसकी गहराई जमीन की सतह से लगभग 120 फीट तक है। इसे इस प्रकार डिजाइन किया गया है कि तीव्र भूकंप जैसी परिस्थितियों में भी इसकी संरचना लगभग 100 वर्ष तक सुरक्षित बनी रह सके। परियोजना राष्ट्रीय राजमार्ग, रेलवे लाइन, भूमिगत संरचनाओं तथा आबादी वाले क्षेत्रों के नीचे से निकाली गई है और निर्माण के दौरान किसी प्रकार की संरचनात्मक अथवा पर्यावरणीय क्षति दर्ज नहीं हुई। प्रभावित परिवारों के पुनर्वास एवं मुआवजा वितरण का कार्य भी नियमानुसार किया गया।

इस सुरंग का निर्माण आसान नहीं रहा। परियोजना पर कार्य कई वर्ष पहले प्रारंभ हुआ था, लेकिन शुरुआती वर्षों में खुदाई की गति अपेक्षाकृत धीमी रही। वर्ष 2015 तक केवल 1,406 मीटर खुदाई हो सकी थी। इसके बाद वर्ष 2016 में अपस्ट्रीम छोर से जर्मनी से मंगाई गई आधुनिक टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) के उपयोग से कार्य में तेजी आई। कठोर चट्टानों, भूगर्भीय जटिलताओं और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के बावजूद इंजीनियरों, तकनीशियनों और हजारों श्रमिकों ने लगातार तीन-तीन आठ घंटे की शिफ्टों में काम जारी रखा, जिसके परिणामस्वरूप अब परियोजना पूर्णता के करीब पहुंच गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह जल सुरंग केवल सिंचाई परियोजना नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश के विंध्य, बघेलखंड और बुंदेलखंड क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था को बदलने वाली आधारभूत संरचना साबित हो सकती है। सिंचाई सुविधा बढ़ने से फसल विविधीकरण, कृषि उत्पादन, पेयजल उपलब्धता और ग्रामीण रोजगार के नए अवसर विकसित होंगे। इससे क्षेत्र से होने वाले पलायन में कमी आने तथा कृषि आधारित उद्योगों को भी प्रोत्साहन मिलने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

इंजीनियरिंग विशेषज्ञों का मानना है कि निर्माण की जटिलता, लंबाई, भूगर्भीय परिस्थितियों और तकनीकी समाधान के कारण स्लीमनाबाद जल सुरंग भविष्य में देश की प्रमुख इंजीनियरिंग परियोजनाओं में केस स्टडी के रूप में भी अध्ययन का विषय बन सकती है।